Wednesday, September 9

नेपाल में हाल की भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है, जिसमें 1,127 लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 3,900 लोग अब भी लापता हैं। इस आपदा के बीच नेपाल ने अपनी कूटनीतिक रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए भारत, चीन और अमेरिका से मदद के बजाय सीधे मुआवजे की मांग की है।

‘मदद नहीं, न्याय और मुआवजा चाहिए’ – नेपाली विदेश मंत्री

नेपाल के विदेश मंत्री ने कांतिपुर न्यूज से बातचीत में कहा कि देश का कूटनीतिक रुख अब पारंपरिक ‘सहायता’ मांगने से हटकर ‘न्याय और मुआवजे’ की दिशा में बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि नेपाल से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन नगण्य है, फिर भी देश एक ऐसे वैश्विक जलवायु संकट की भारी कीमत चुका रहा है, जिसे उसने पैदा नहीं किया।

खनाल ने आगे कहा कि यह मामला चैरिटी का नहीं, बल्कि कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी का है। उनके अनुसार, दुनिया के सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देशों   चीन (पहले स्थान पर), अमेरिका (दूसरे) और भारत (तीसरे) की यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी बनती है कि वे नेपाल जैसे कमजोर और जलवायु-प्रभावित देशों को क्षतिपूर्ति दें।

संयुक्त राष्ट्र फंड से मांगी आर्थिक मदद

द काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल सरकार ने ‘फंड फॉर रिस्पॉन्डिंग टू लॉस एंड डैमेज’ (FRLD) के बोर्ड को एक औपचारिक अनुरोध पत्र भेजा है। इसमें 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ से हुए नुकसान की भरपाई के लिए आर्थिक सहायता मांगी गई है। FRLD, संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के तहत काम करने वाली एक वित्तीय संस्था है, जो जलवायु परिवर्तन से अपरिवर्तनीय नुकसान झेल रहे विकासशील देशों की मदद करती है।

इस पत्र पर नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले और कृषि मंत्री गीता चौधरी के हस्ताक्षर हैं। वन मंत्रालय के संयुक्त सचिव और FRLD बोर्ड सदस्य महेश्वर ढकाल ने बताया कि पत्र में नुकसान की सटीक राशि स्पष्ट नहीं की गई है, और यह बोर्ड पर निर्भर करेगा कि वह कितनी सहायता देता है। उन्होंने कहा कि नेपाल बोर्ड की अगली बैठक (10 दिसंबर प्रस्तावित) से पहले ही तत्काल जवाब और समर्थन चाहता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह पहला मौका है जब नेपाल ने इस वैश्विक संस्था से सहायता मांगी है।

अन्य छोटे देशों के लिए भी खुल सकता है रास्ता

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नेपाल इस फंड से मदद हासिल करने में सफल रहता है, तो इससे जलवायु परिवर्तन से प्रभावित अन्य छोटे और कमजोर देशों के लिए भी अंतरराष्ट्रीय मुआवजा हासिल करने का एक नया रास्ता खुल सकता है। साथ ही, नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में भेजे जाने की भी योजना बन रही है, ताकि इस मांग को वैश्विक मंच पर प्रमुखता से उठाया जा सके।

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