रूद्र फाउंडेशन नशा मुक्ति केंद्र में हत्या की कहानी-
देवघर के 14 वर्षीय अक्षत केसरी की मौत को लेकर झारखंड डिजिटल लगातार सवाल उठाता रहा है। जिस बच्चे को परिवार ने नशे की लत से बाहर निकालने और उसकी जिंदगी सुधारने की उम्मीद में जसीडीह के रुद्र फाउंडेशन नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती कराया था, कुछ ही दिनों बाद उसी बच्चे की मौत ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए।
अक्षत की मौत के बाद मामला सिर्फ एक बच्चे की मौत तक सीमित नहीं रहा। केंद्र में उसकी सुरक्षा, वहां काम करने वाले लोगों की भूमिका, बेरहमी से की गई मारपीट, CCTV फुटेज, दूसरे मरीजों के साथ प्रताड़ना, संचालकों की जिम्मेदारी और पुलिस जांच – एक के बाद एक कई सवाल सामने आते गए।
परिवार की ओर से भी लगातार गंभीर आरोप लगाए गए। वहीं FIR में दर्ज घटनाक्रम ने मामले को और गंभीर बना दिया है।
लेकिन अब इस कहानी में एक और कड़ी सामने आई है।
और यह कड़ी है – पागल बाबा अस्पताल।
अब तक क्या सामने आया?
दर्ज FIR में बताया गया है कि अक्षत को रुद्र फाउंडेशन में बेरहमी से पीटा गया। FIR में यह भी उल्लेख है कि अभिरभाव मुखर्जी ने अक्षत को स्टील के पाइप से पीटा। मारपीट के बाद अक्षत की हालत इतनी गंभीर हो गई कि उसने हलचल करना बंद कर दिया। इसके बाद उसे अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल का नाम है – पागल बाबा अस्पताल।
वहां डॉक्टर ने अक्षत को मृत घोषित कर दिया।
यानी अक्षत की मौत की कहानी में रुद्र फाउंडेशन के बाद अगली महत्वपूर्ण जगह यही अस्पताल बन जाता है।
एक 14 साल का बच्चे को बेरहमी से पिटने के बाद अस्पताल पहुंचाया जाता है। FIR में स्टील के पाइप से मारने की बात दर्ज है।
परिवार की ओर से बच्चे के शरीर पर चोटों और करंट के निशान को लेकर भी गंभीर दावे सामने आये हैं।
अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया और शरीर को वापस नशा मुक्ति केंद्र को सौंप दिया गया।
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अब सोचने वाली बात ये है कि –
क्या डॉक्टर को बच्चे के शरीर पर चोटों के निशान दिखाई नहीं दिए?
क्या डॉक्टर ने उन चोटों को अपने मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज किया?
क्या डॉक्टर ने पुलिस को तत्काल सूचना दी?
क्या इस मौत को मेडिको-लीगल केस के तौर पर दर्ज किया गया?
और अगर ये सारी प्रक्रियाएं हुईं, तो उनकी जानकारी जांच में कहां है?
और अगर नहीं हुई है दर्ज तो इसके पीछे क्या वजह रही होगी ? क्या प्रशासन को भी यह एंगल नहीं दिखा ?
आखिर वो डॉक्टर कौन है जिसने अक्षत को मृत घोषित किया था और उस डॉक्टर का नाम FIR में क्यों नहीं है ?
यही वह सवाल है जिसे अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
FIR दर्ज हुई लेकिन जिस अस्पताल में अक्षत को ले जाया गया और जहां डॉक्टर ने उसे मृत घोषित किया, उस डॉक्टर की भूमिका पर सार्वजनिक तौर पर इतनी चुप्पी क्यों है?
अगर एक नाबालिग बच्चा गंभीर चोटों के बाद अस्पताल पहुंचता है और वहां उसे मृत घोषित किया जाता है, तो क्या अस्पताल की जिम्मेदारी सिर्फ मृत्यु घोषित करने तक खत्म हो जाती है?
नहीं। ऐसी मौत की परिस्थितियों में अस्पताल द्वारा अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया जांच का अहम हिस्सा होनी चाहिए।
पागल बाबा अस्पताल से पूछा जाना चाहिए कि – पुलिस को सुचना क्यों नहीं दी गई ?
यह सवाल बेहद गंभीर है क्योंकि मामला किसी बुजुर्ग व्यक्ति की सामान्य बीमारी से हुई मौत का नहीं था। मामला एक 14 वर्षीय बच्चे का था, जो मारपीट के बाद गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचा था। ऐसे में अगर अस्पताल ने पुलिस को तत्काल सूचना नहीं दी, तो सवाल उठाना तो लाज़मी है।
इन सवालों का जवाब अब अस्पताल को देना ही चाहिए।
‘मृत घोषित’ करने के बाद शव की प्रक्रिया किस नियम से हुई?
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थानेदार साहब भूल गए डॉक्टर का नाम ?
अक्षत को मृत घोषित करने वाले डॉक्टर का नाम और उनकी भूमिका चार्जशीट में स्पष्ट क्यों नहीं है?
थानेदार साहब, इतनी जल्दी किस बात की थी? जब उसे अस्पताल में ही मृत घोषित कर दिया गया था तो उस अस्पताल के डॉक्टर से पूछताछ क्यों नहीं हुई ?
एक के बाद एक परत खुल रही है, लेकिन जांच में इतनी बड़ी चूक कैसे?
क्या हॉस्पिटल के CCTV खंगाले गए ?
FIR में पागल बाबा अस्पताल के फुटेज का भी उल्लेखनीय नहीं किया गया है। यह सब महत्वपूर्ण कड़ी है जो नज़रअंदाज़ कर दिए गए है। इन पर चर्चा कब होगी ? किसको बचाना चाहती है प्रशासन ?
अब देखना यह है कि जांच एजेंसी इन सवालों के जवाब तलाशती है या फिर अक्षत की मौत भी उन मामलों की फाइल में दबकर रह जाएगी, जहां गिरफ्तारी तो हो जाती है, लेकिन पूरी सच्चाई कभी सामने नहीं आती।
अक्षत को न्याय सिर्फ आरोपियों की गिरफ्तारी से नहीं मिलेगा। न्याय तब मिलेगा, जब उसकी मौत से जुड़ी हर कड़ी की जांच होगी – और जहां भी लापरवाही, चूक या मिलीभगत सामने आएगी, वहां जिम्मेदारी भी तय होगी।
Jharkhand Digital का सवाल साफ है – अक्षत की मौत का पूरा सच कब सामने आएगा?
[ अक्षत केसरी केस ]
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