गढ़वा। विकास योजनाओं का मकसद लोगों की मुश्किलें कम करना और आवागमन को आसान बनाना होता है, लेकिन गढ़वा जिले के धुरकी प्रखंड में कनहर नदी के बालचौरा पर बनी तस्वीर कुछ अलग कहानी बयां कर रही है। झारखंड और छत्तीसगढ़ को जोड़ने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये की लागत से पुल का निर्माण पूरा हो चुका है, लेकिन पुल तक पहुंचने के लिए जरूरी एप्रोच रोड यानी पहुंच पथ का काम अधूरा होने के कारण पूरी योजना का लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा है।
पुल का ढांचा तैयार होने के बाद भी दोनों राज्यों के सीमावर्ती इलाकों के करीब 40 हजार लोगों के लिए नदी पार करना आज भी चुनौती बना हुआ है। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि पुल शुरू होने के बाद उन्हें सुरक्षित और सुगम रास्ता मिलेगा, लेकिन पहुंच पथ के अभाव ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
पुल बना, लेकिन रास्ता नहीं; अधूरी योजना ने बढ़ाई परेशानी
बालचौरा में कनहर नदी पर बना यह पुल क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका उद्देश्य झारखंड और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्रों के बीच आवागमन को बेहतर करना है। पुल तैयार होने के बाद लोगों को लगा था कि अब नदी पार करने के लिए पुराने और जोखिम भरे रास्तों पर निर्भरता खत्म हो जाएगी।
लेकिन पुल के दोनों ओर पहुंच पथ नहीं बनने के कारण वाहन और आम लोग पुल का इस्तेमाल अपेक्षित तरीके से नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद योजना का अंतिम और सबसे जरूरी हिस्सा पूरा नहीं हो सका है।
40 हजार ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी पर असर
इस इलाके में बड़ी संख्या में ग्रामीणों की आवाजाही झारखंड और छत्तीसगढ़ के बीच होती है। बाजार, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य जरूरी कामों के लिए लोगों को एक-दूसरे के क्षेत्र में जाना पड़ता है।
ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि पुल तैयार होने के बावजूद उन्हें उसका सीधा लाभ नहीं मिल रहा। नदी पार करने के लिए अब भी उन्हें जोखिम उठाना पड़ता है। खासकर उन परिवारों के लिए यह परेशानी अधिक है, जिन्हें रोजाना किसी न किसी काम से नदी के दूसरी तरफ जाना पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि पहुंच पथ तैयार हो जाए तो दोनों राज्यों के सीमावर्ती गांवों के बीच संपर्क काफी आसान हो सकता है।
बरसात में कनहर नदी बन जाती है बड़ी चुनौती
गर्मी या सामान्य मौसम में किसी तरह नदी पार कर लेना संभव हो सकता है, लेकिन बरसात के दौरान हालात काफी कठिन हो जाते हैं। कनहर नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ नदी पार करना ग्रामीणों के लिए जोखिम भरा हो जाता है।
बारिश के दिनों में आवागमन प्रभावित होने का सीधा असर दैनिक जरूरतों पर पड़ता है। किसी को बाजार जाना हो, किसी मरीज को अस्पताल ले जाना हो या बच्चों को जरूरी काम से बाहर जाना हो, नदी और खराब पहुंच मार्ग दोनों बड़ी बाधा बन जाते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि पुल बनने के बाद उन्हें ऐसी परेशानियों से राहत मिलने की उम्मीद थी, लेकिन पहुंच पथ का काम पूरा नहीं होने से समस्या जस की तस बनी हुई है।
सिर्फ पुल नहीं, पूरी कनेक्टिविटी जरूरी
बालचौरा का मामला यह सवाल भी खड़ा करता है कि किसी बड़ी सड़क या पुल परियोजना की सफलता सिर्फ मुख्य ढांचे के निर्माण से कैसे सुनिश्चित हो सकती है। पुल बनने के बाद यदि उसके दोनों छोर को सड़क नेटवर्क से नहीं जोड़ा जाए तो करोड़ों रुपये की लागत से तैयार ढांचा अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता।
ग्रामीणों के अनुसार पुल के साथ पहुंच पथ का निर्माण भी प्राथमिकता के आधार पर पूरा होना चाहिए था। इससे न केवल लोगों का समय और जोखिम कम होता, बल्कि दोनों राज्यों के बीच व्यापारिक और सामाजिक संपर्क भी मजबूत होता।
प्रशासन से जल्द काम पूरा कराने की मांग
स्थानीय लोगों ने संबंधित विभाग और जिला प्रशासन से पहुंच पथ का निर्माण जल्द पूरा कराने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि जब पुल का निर्माण हो चुका है तो अब उसके दोनों ओर संपर्क मार्ग तैयार करने में देरी नहीं होनी चाहिए।
लोगों को उम्मीद है कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अधूरे पहुंच पथ का काम पूरा कराएगा। यदि यह काम पूरा हो जाता है तो झारखंड-छत्तीसगढ़ सीमा के हजारों ग्रामीणों को सुरक्षित आवागमन की सुविधा मिल सकती है और लंबे समय से चली आ रही नदी पार करने की समस्या से भी राहत मिलेगी।
फिलहाल स्थिति यह है कि पुल मौजूद है, लेकिन उस तक पहुंचने का रास्ता अधूरा है। ऐसे में करोड़ों की लागत से तैयार यह पुल ग्रामीणों के लिए सुविधा बनने के बजाय अधूरी विकास योजना की तस्वीर बनकर रह गया है।
