रांची। राजधानी रांची में केंद्रीय अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (CARA) की ओर से क्षेत्रीय परामर्श बैठक आयोजित की गई। बैठक में बच्चों के अडॉप्शन की प्रक्रिया को बेहतर बनाने, देश में ही भारतीय बच्चों को अधिक से अधिक गोद लेने और लोगों के बीच अडॉप्शन को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर चर्चा हुई। खास तौर पर विशेष जरूरतों वाले और दिव्यांग बच्चों के अडॉप्शन को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया।
बैठक में ईस्टर्न जोन के पांच राज्यों झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और सिक्किम के अधिकारी शामिल हुए। इसके अलावा बाल संरक्षण और अडॉप्शन प्रक्रिया से जुड़े विभिन्न स्टेकहोल्डर्स ने भी हिस्सा लिया। बैठक का मुख्य उद्देश्य अडॉप्शन व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों की पहचान करना और विशेष जरूरतों वाले बच्चों को परिवार उपलब्ध कराने की दिशा में प्रभावी कदमों पर विचार करना था।
संस्थाओं में रह रहे करीब 70 प्रतिशत स्पेशल नीड्स श्रेणी के बच्चे
CARA की सीईओ भावना सक्सेना ने बताया कि कार्यशाला में चाइल्ड वेलफेयर कमिटी (CWC), डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट (DCPU) और चाइल्ड केयर संस्थानों से जुड़े अधिकारियों सहित अडॉप्शन सिस्टम के विभिन्न हितधारकों को शामिल किया गया है।
उन्होंने कहा कि संस्थाओं में रहने वाले बच्चों में करीब 70 प्रतिशत बच्चे स्पेशल नीड्स श्रेणी के हैं, लेकिन इन बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी है। ऐसे में बैठक के दौरान इस बात पर मंथन किया जा रहा है कि विशेष जरूरतों वाले बच्चों के अडॉप्शन को किस तरह बढ़ावा दिया जाए और संभावित दत्तक माता-पिता को इस दिशा में जागरूक किया जाए।
कानूनी प्रक्रिया पूरी करना सबसे बड़ी चुनौती
भावना सक्सेना ने बताया कि अडॉप्शन की प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौतियों में बच्चों की सही पहचान करना और उन्हें निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत संबंधित संस्थाओं तक पहुंचाना शामिल है। कई बार बच्चे निर्धारित प्रक्रिया के तहत चाइल्ड वेलफेयर कमिटी के समक्ष नहीं पहुंच पाते, जिससे उनके अडॉप्शन की प्रक्रिया आगे बढ़ने में कठिनाई होती है।
उन्होंने कहा कि कानूनी रूप से अडॉप्शन की प्रक्रिया पूरी करने के लिए जरूरी है कि बच्चों को पहले निर्धारित प्रक्रिया के तहत संस्थाओं में लाया जाए और चाइल्ड वेलफेयर कमिटी के सामने प्रस्तुत किया जाए। इसके बाद कमिटी बच्चे के जैविक माता-पिता या परिवार का पता लगाने की प्रक्रिया शुरू करती है। इसके लिए मीडिया और अन्य माध्यमों की मदद ली जाती है, ताकि बच्चे के परिवार का पता चल सके।
क्या है CARA, बच्चों के अडॉप्शन में क्या है इसकी भूमिका?
केंद्रीय अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (CARA) भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाली केंद्रीय प्राधिकरण है। यह देश में कानूनी रूप से बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया की निगरानी और नियमन करता है। CARA घरेलू और अंतरदेशीय अडॉप्शन की निर्धारित प्रक्रिया को संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका उद्देश्य बच्चों के सर्वोत्तम हितों की रक्षा करते हुए उन्हें सुरक्षित और स्थायी पारिवारिक वातावरण उपलब्ध कराना है।
कानूनी मंजूरी के बाद CARA पोर्टल से आगे बढ़ती है प्रक्रिया
निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत बच्चे के माता-पिता या परिवार का पता नहीं चलने और अन्य आवश्यक शर्तें पूरी होने पर चाइल्ड वेलफेयर कमिटी बच्चे को कानूनी रूप से अडॉप्शन के लिए मुक्त घोषित करती है। इसके बाद CARA के डिजिटल पोर्टल के माध्यम से अडॉप्शन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है।
बैठक में इस बात पर भी जोर दिया गया कि भारत में ही भारतीय बच्चों के अडॉप्शन को प्रोत्साहित किया जाए। साथ ही, विशेष जरूरतों वाले बच्चों को गोद लेने के प्रति समाज में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने और अडॉप्शन प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की जरूरत पर चर्चा हुई।
CARA की इस क्षेत्रीय परामर्श बैठक को पूर्वी भारत में अडॉप्शन व्यवस्था को मजबूत बनाने, कानूनी प्रक्रिया से जुड़ी बाधाओं को दूर करने और जरूरतमंद बच्चों को परिवार का सहारा उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।
