रांची: इलाज कराने के बाद अस्पताल का बिल हाथ में आता है तो आम मरीज आमतौर पर रकम देखता है, हर जांच और प्रक्रिया का हिसाब नहीं। लेकिन रांची के कश्यप मेमोरियल आई हॉस्पिटल से सामने आया मामला इसी बिलिंग व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। अस्पताल प्रबंधन की अपनी शिकायत में बिल, मेडिकल रिकॉर्ड और बिलिंग सॉफ्टवेयर के आंकड़ों के बीच ऐसे अंतर का दावा किया गया है, जिसका वित्तीय असर करीब 90 लाख से एक करोड़ रुपये तक बताया गया है।
अगर अस्पताल के अपने रिकॉर्ड ही एक-दूसरे से मेल नहीं खाते, तो मरीजों को दिए गए बिल कितने भरोसेमंद थे?
मामले में अस्पताल के निदेशक डॉ. वीरेंद्र प्रसाद कश्यप की शिकायत पर तीन कर्मचारियों- आशुतोष कुमार, अंकित कुमार और संतोषी कुमारी के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। इन पर फर्जी बिल तैयार करने, बिलों में फोटोशॉप या दूसरे फोटो एडिटिंग माध्यम से बदलाव करने और बिलिंग सॉफ्टवेयर में छेड़छाड़ के जरिए अस्पताल को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का आरोप है।
एक ही सेवा के आंकड़े में लाखों का खेल?
अस्पताल की प्रारंभिक जांच और पुलिस को दी गई शिकायत में कुछ मेडिकल सेवाओं के वास्तविक रिकॉर्ड और सॉफ्टवेयर में दर्ज संख्या के बीच बड़ा अंतर बताया गया है।
B-Scan की संख्या अस्पताल के रिकॉर्ड में 8,483 बताई गई, जबकि सॉफ्टवेयर में 7,745 दर्ज है। 738 की इस कमी का वित्तीय अंतर करीब 11.07 लाख रुपये बताया गया है।
POOculyzer में रिकॉर्ड 2,421 और सॉफ्टवेयर 1,523 बताया गया। यानी 898 का अंतर, जिसका वित्तीय प्रभाव करीब 40.41 लाख रुपये बताया गया है।
Tricort Injection में 1,064 के मुकाबले सॉफ्टवेयर में 487 दर्ज होने का दावा है। 577 के अंतर की राशि करीब 23.08 लाख रुपये बताई गई है।
वहीं OPTOS में रिकॉर्ड 8,359 और सॉफ्टवेयर में 6,695 की संख्या बताई गई है। 1,664 के अंतर का वित्तीय प्रभाव करीब 16.64 लाख रुपये बताया गया है।
इन चार मदों में बताए गए वित्तीय अंतर को जोड़ें तो रकम करीब 91 लाख रुपये बैठती है। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि दूसरे रिकॉर्ड और समायोजन की जांच के बाद यह आंकड़ा और बढ़ सकता है।
मरीजों से कितना वसूला गया?
शिकायत में दावा किया गया है कि मरीजों को दिए गए बिल और अस्पताल के बिलिंग सॉफ्टवेयर में दर्ज रिकॉर्ड में भी अंतर मिला। मूल बिलों में फोटोशॉप या अन्य एडिटिंग माध्यम से बदलाव किए जाने का आरोप है।
अगर यह आरोप जांच में सही साबित होता है, तो सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि अस्पताल का कितना पैसा गायब हुआ। सवाल यह भी होगा कि मरीजों को कौन-सा बिल दिया गया, उसमें क्या रकम लिखी गई और अस्पताल के सिस्टम में उसी मरीज का वास्तविक रिकॉर्ड क्या था?
यानी जिस बिल को मरीज अंतिम और सही मानकर भुगतान करता है, उसकी विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़ा हो रहा है।
अस्पताल की बिलिंग व्यवस्था पर सवाल…
इतने बड़े अंतर का दावा सामने आने के बाद अस्पताल की अपनी निगरानी व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। अगर बिलिंग रिकॉर्ड, मरीजों के बिल और सॉफ्टवेयर के आंकड़ों में इतना बड़ा अंतर लंबे समय तक बना रहा, तो आंतरिक ऑडिट और निगरानी तंत्र को इसकी भनक क्यों नहीं लगी?
क्या बिल बनने के बाद उसका नियमित मिलान होता था?
क्या सॉफ्टवेयर में किए गए बदलावों की निगरानी होती थी?
क्या मरीजों को दिए गए बिलों का मूल रिकॉर्ड से सत्यापन किया जाता था?
मरीजों से लिए गए पैसे की भरपाई कौन करेगा?
अगर जांच में यह सामने आता है कि मरीजों से अवैध तरीके से पैसे लिए गए हैं, तो क्या कश्यप मेमोरियल आई हॉस्पिटल उन मरीजों को उनके पैसे की भरपाई करेगा?
अब फोरेंसिक जांच बताएगी पूरा सच
अस्पताल प्रबंधन ने पुलिस से डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने और जरूरत पड़ने पर फोरेंसिक जांच कराने का अनुरोध किया है। साथ ही संबंधित बैंक खातों और लेन-देन की जांच, कर्मचारियों के बयान और दूसरे जुड़े लोगों की भूमिका की जांच की मांग की गई है।
