FIR को सही पाए जाने के बावजूद डेढ़ साल से अटकी जांच पर अदालत की टिप्पणी – अनिश्चितकाल तक फाइल लंबित नहीं रख सकता कैबिनेट सचिवालय और सतर्कता विभाग; जल्द निर्णय लेने की अपेक्षा
रांची। झारखंड के पूर्व खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री सरयू राय से जुड़े आहार पत्रिका प्रकाशन मामले में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि इस मामले में जांच आगे बढ़ाने को लेकर कैबिनेट सचिवालय एवं सतर्कता विभाग के पास लंबित फाइल को अनिश्चितकाल तक नहीं रोका जा सकता। सक्षम प्राधिकार को इस पर शीघ्र उचित निर्णय लेना चाहिए। न्यायमूर्ति अनुभा रावत चौधरी की अदालत ने 4 नवंबर 2026 को इस टिप्पणी के साथ याचिका का निष्पादन कर दिया।
मामला पूर्व मंत्री सरयू राय के कार्यकाल में खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग की ओर से प्रकाशित होने वाली आहार पत्रिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता मनोज सिंह ने आरोप लगाया था कि अक्टूबर 2017 से मार्च 2019 के बीच पत्रिका की छपाई, प्रकाशन और वितरण के नाम पर सरकारी धन का कथित दुरुपयोग किया गया। इस पूरे प्रकरण में 3 करोड़ 38 लाख 26 हजार 473 रुपये के अनुचित लाभ और सरकारी राशि के गबन का आरोप लगाया गया है। हालांकि, ये आरोप हैं और अदालत ने अपने आदेश में किसी आरोपी को दोषी घोषित नहीं किया है।
FIR दर्ज, लेकिन जांच की रफ्तार पर उठे सवाल
इस मामले में 6 सितंबर 2024 को रांची के अरगोड़ा थाना में कांड संख्या 228/2024 दर्ज कराया गया था। प्राथमिकी में भारतीय दंड संहिता की धारा 403, 406, 408, 409, 420 और 120बी के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, 11, 12 और 13(2) के तहत कार्रवाई की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता मनोज सिंह का कहना था कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद जांच एक स्तर पर पहुंचकर ठहर गई। उन्होंने आरोप लगाया कि मामले में आवश्यक साक्ष्य उपलब्ध कराए जाने के बावजूद जांच पूरी नहीं हुई और संबंधित फाइल आगे की कार्रवाई के लिए लंबित रही। इसी आधार पर उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर मामले की जांच सीबीआई, एसीबी या किसी अन्य स्वतंत्र जांच एजेंसी से कराने की मांग की थी।
पुलिस के हलफनामे में आरोपों को सही पाए जाने का जिक्र
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वरीय अधिवक्ता ने पुलिस की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे का हवाला दिया। हलफनामे के पैरा 18 में कहा गया था कि मामले की जांच और पर्यवेक्षण के दौरान भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोपों को सही पाया गया है।
इस हलफनामे में तत्कालीन खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री सरयू राय, उनके निजी सचिव आनंद कुमार, सुनील शंकर, बाबा कंप्यूटर्स के मालिक रितेश गुप्ता और जेपीपीएल के प्रबंध निदेशक का नाम शामिल किया गया था।
हालांकि, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आगे की कार्रवाई के लिए सक्षम प्राधिकार से पूर्व अनुमति आवश्यक बताई गई थी। इसी कारण संबंधित अनुमति मिलने के बाद आगे की कार्रवाई करने की बात कही गई थी। पुलिस के हलफनामे में यह भी उल्लेख था कि मामला जांच के अधीन है।
ACB को जांच सौंपने के लिए 2025 से लंबित है फाइल
मामले की सुनवाई में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि इस केस को आगे की जांच के लिए झारखंड एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) को सौंपने की प्रक्रिया पहले से लंबित है।
राज्य सरकार की ओर से दाखिल पूरक जवाबी हलफनामे के पैरा 6 और 7 में बताया गया था कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े मामलों की आगे की जांच एसीबी द्वारा की जाती है। इसके लिए सक्षम प्राधिकार की अनुमति जरूरी है।
हलफनामे के मुताबिक, पुलिस मुख्यालय के पत्र संख्या 1385/X, दिनांक 4 जून 2025 के आधार पर अरगोड़ा थाना कांड संख्या 228/2024 को आगे की जांच के लिए एसीबी को सौंपने के संबंध में कैबिनेट सचिवालय एवं सतर्कता विभाग से आवश्यक दिशा-निर्देश मांगे गए थे।
यानी जून 2025 से ही इस मामले को एसीबी के हवाले करने की प्रक्रिया सरकारी स्तर पर लंबित बताई गई। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में सवाल उठाया गया कि जब मामला पहले से संबंधित विभाग के पास विचाराधीन है, तो इस पर अनिश्चितकाल तक निर्णय क्यों नहीं लिया जा रहा है?
CBI ने उठाई तकनीकी आपत्ति, सरयू राय को पक्षकार नहीं बनाने का मुद्दा
सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से एक तकनीकी आपत्ति भी उठाई गई। सीबीआई के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि जिस व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई है, उसे इस रिट याचिका में पक्षकार नहीं बनाया गया है। याचिका में पूर्व मंत्री सरयू राय के खिलाफ दर्ज मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि इस मामले में पहले ही जवाबी और पूरक जवाबी हलफनामा दाखिल किया जा चुका है। अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों को देखा। राज्य सरकार की ओर से सुनवाई के दौरान कोई अधिवक्ता उपस्थित नहीं हुआ, लेकिन सरकार की तरफ से दाखिल हलफनामे रिकॉर्ड पर मौजूद थे।
हाईकोर्ट की दो टूक – अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रह सकती फाइल
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पूरक जवाबी हलफनामे से यह स्पष्ट है कि अरगोड़ा थाना कांड संख्या 228/2024 को आगे की जांच के लिए एसीबी को सौंपने के संबंध में कैबिनेट सचिवालय एवं सतर्कता विभाग से आवश्यक निर्देश मांगे गए हैं।
चूंकि मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से भी संबंधित है और आगे की जांच एसीबी द्वारा किए जाने की आवश्यकता बताई गई है, इसलिए सक्षम प्राधिकार को इस पर निर्णय लेना होगा।
अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की कि कैबिनेट सचिवालय एवं सतर्कता विभाग के समक्ष यह मामला अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रह सकता। यदि अब तक इस संबंध में उचित निर्णय नहीं लिया गया है, तो संबंधित प्राधिकार से अपेक्षा की जाती है कि वह शीघ्र उचित निर्णय ले।
इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने मनोज सिंह की रिट याचिका का निष्पादन कर दिया। हालांकि, अदालत ने सीधे सीबीआई जांच का आदेश नहीं दिया और न ही किसी आरोपी के खिलाफ दोष सिद्ध होने की घोषणा की।
अब निगाहें सरकार के फैसले पर, क्या ACB संभालेगी जांच?
हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद अब इस पूरे मामले में राज्य सरकार के अगले कदम पर निगाहें टिकी हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि कैबिनेट सचिवालय एवं सतर्कता विभाग एसीबी को जांच सौंपने के प्रस्ताव पर कब तक निर्णय लेता है।
करीब दो साल पहले दर्ज प्राथमिकी और जून 2025 से सरकारी स्तर पर लंबित बताई जा रही प्रक्रिया के बाद अब अदालत की टिप्पणी ने मामले को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। आहार पत्रिका के प्रकाशन, छपाई और वितरण में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच आगे बढ़ती है या नहीं, इसका जवाब अब सक्षम प्राधिकार के फैसले पर निर्भर करेगा।
फिलहाल हाईकोर्ट का संदेश साफ है—भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में जांच की प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक फाइलों में दबाकर नहीं रखा जा सकता।
