12 साल से ज्यादा चलेगा खनन, 19 प्रतिशत बिलो पर JMS को मिला ठेका
विस्थापितों के अधिकार की आड़ में कोल डंप कमेटी और ट्रक ऑनर्स एसोसिएशन के जरिए वसूली की आशंका
CCL और स्थानीय पुलिस की व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल
कोयलांचल में कोयले का कारोबार जितना बड़ा है, उससे भी बड़ा यहां वर्चस्व और वसूली का खेल है। पिपरवार की अंडरग्राउंड (UG) माइंस में नई माइनिंग परियोजना शुरू होने की तैयारी के बीच एक बार फिर नक्सली प्रभाव, कथित टेरर फंडिंग और विस्थापितों के नाम पर अवैध वसूली की आशंकाएं चर्चा में हैं। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि खनन परियोजना के साथ ही कुछ ऐसे पुराने चेहरे फिर सक्रिय हो रहे हैं, जिनकी भूमिका को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि विस्थापितों के अधिकार, रोजगार और स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दिलाने के नाम पर संगठनों का एक नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। इसमें कोल डंप कमेटी और ट्रक ऑनर्स एसोसिएशन जैसे मंचों की भूमिका भी पूर्व से जांच के दायरे में है। कई बार आरोप लगे हैं कि इन संगठनों के जरिए खनन कंपनी, ट्रांसपोर्टिंग से जुड़े कारोबारियों और स्थानीय व्यावसायिक गतिविधियों पर दवाब बनाकर टेरर फंडिंग की जाती है।
महेंद्र गंझू समेत कई नामों को लेकर चर्चा, जांच की मांग
पिपरवार में कथित वसूली नेटवर्क को लेकर महेंद्र गंझू, आशिक अली, मो. ताज, रोहन गंझू और रचित गंझू समेत कुछ अन्य लोगों के नाम चर्चा में बताए जा रहे हैं। आरोपों में महेंद्र गंझू की भूमिका को लेकर जबरदस्त सवाल उठाए जा रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या पिपरवार में कोयला कारोबार से जुड़े फैसलों और स्थानीय गतिविधियों पर कुछ चुनिंदा लोगों का प्रभाव स्थापित हो रहा है? क्या कोल डंप, ट्रांसपोर्टिंग और रोड सेल के नाम पर अवैध आर्थिक वसूली की तैयारी के पीछे नक्सल संरक्षण हावी है? इन सवालों का जवाब स्थानीय पुलिस, प्रशासन और CCL प्रबंधन के पास है कि आखिर क्या कारण है कि आज भी विस्थापितों का हाल बेहाल है जबकि यह कथित विस्थापित नेता लोग लागातार मालामाल होते जा रहे हैं।
जानिए परियोजना की खास बातें
परियोजना की पहली बिडिंग 10 नवंबर को निर्धारित बताई जा रही है। पिपरवार एरिया के GM सुजीत कुमार सिन्हा ने बताया कि ठेका प्रक्रिया में जाऍ माइनिंग सर्विस (JMS )ने 19 प्रतिशत बिलो पर बोली लगाकर माइनिंग का काम हासिल किया है। जानकारी के अनुसार कंपनी को 1,893 रुपये प्रति टन की दर से माइनिंग का आदेश मिला है। लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेजों की मानें तो Piparwar Phase-I UG की परियोजना अवधि 14 वर्ष और अनुमानित लागत 390.32 करोड़ रुपये दर्ज है। JMS Mining को परियोजना का MDO ठेका 9 मई 2022 को दिए जाने और 29 अगस्त 2022 को समझौता होने का उल्लेख भी शामिल है. परियोजना की प्रस्तावित उत्पादन क्षमता 0.87 मिलियन टन सालाना बताई गई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों की इस परियोजना से स्थानीय विस्थापितों को वास्तविक लाभ मिलेगा या उनके अधिकारों के नाम पर एक नया वसूली तंत्र खड़ा होगा? वर्षों तक चलने वाली इस परियोजना के शुरू होने से पहले ही स्थानीय स्तर पर हितों के टकराव और कथित वसूली नेटवर्क को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
नक्सली फंडिंग की आशंका , पहले से NIA की रडार पर
पिपरवार और आसपास का कोयलांचल लंबे समय से सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र रहा है। पूर्व से भी NIA इस पूरे इलाके को रडार पर रखकर जांच कर रही है लेकिन विस्थापितों की आड़ में चलने वाले कोल डंप कमिटी और इलाके के ट्रक ऑनर्स एसोसिएशन के नेताओं का लगातार बढ़ता वर्चस्व और निवेश रक प्रवर्तन निदेशालय (ईडी ) की नजर भी बतायी जा रही है। ऐसे औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े कारोबार पर आपराधिक और उग्रवादी प्रभाव की आशंका सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बन गयी है। विस्थापन, रोजगार, ट्रांसपोर्टिंग और कोयला कारोबार से जुड़े विवादों का इस्तेमाल यदि किसी प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन के लिए आर्थिक लाभ जुटाने में किया जाता है, तो यह गंभीर सुरक्षा मामला बन सकता है। ऐसे में पुलिस, खुफिया तंत्र और CCL की सुरक्षा इकाइयों को कथित वसूली की शिकायतों की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। विस्थापितों के वास्तविक अधिकारों की लड़ाई को कुछ लोग अपने आर्थिक हितों के लिए इस्तेमाल तो नहीं कर रहे।
विस्थापितों के हित में CCL की पहल, लेकिन निगरानी कितनी मजबूत?
CCL प्रबंधन की ओर से विस्थापितों के हितों को प्राथमिकता देने, स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने और रोड सेल की प्रक्रिया को गति देने की बात कही जाती रही है। लेकिन योजनाओं का लाभ वास्तविक विस्थापितों तक पहुंचे, इसके लिए पारदर्शी व्यवस्था जरूरी है।रोड सेल में स्थानीय लोगों की भागीदारी, ट्रक ऑनर्स की समस्याओं का समाधान और कोल डंप से संबंधित निर्णय नियमों के तहत होने चाहिए। यदि इन प्रक्रियाओं में किसी बाहरी दबाव, संगठन विशेष के एकाधिकार या कथित अवैध वसूली की शिकायतें आती हैं तो CCL को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए। विस्थापितों के नाम पर किसी भी तरह की उगाही न केवल स्थानीय लोगों के अधिकारों का हनन है, बल्कि इससे कंपनी की परियोजना और औद्योगिक माहौल भी प्रभावित हो सकता है।
CCL, पुलिस और खुफिया एजेंसियों के सामने कई सवाल
पिपरवार UG माइंस की परियोजना शुरू होने के साथ कई सवाल खड़े हैं
क्या स्थानीय विस्थापितों को रोजगार और कारोबार में पारदर्शी हिस्सेदारी मिलेगी?
क्या कोल डंप कमेटी और ट्रक ऑनर्स एसोसिएशन की गतिविधियों पर CCL की निगरानी होगी?
क्या कथित वसूली की शिकायतों की जांच होगी?
और सबसे महत्वपूर्ण, क्या किसी प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन तक अवैध वसूली की रकम पहुंचने की आशंका की जांच की जाएगी?
इन सवालों पर CCL प्रबंधन, जिला पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की जवाबदेही महत्वपूर्ण है। परियोजना से जुड़े प्रत्येक वित्तीय लेनदेन, परिवहन व्यवस्था और स्थानीय संगठनों की भूमिका की नियमसम्मत निगरानी होनी चाहिए। पिपरवार की UG माइंस केवल कोयला उत्पादन की परियोजना नहीं है, बल्कि इससे स्थानीय रोजगार, विस्थापन और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था भी जुड़ी है। इसलिए जरूरी है कि विकास की इस परियोजना को किसी कथित वसूली नेटवर्क या आपराधिक दबाव का माध्यम न बनने दिया जाए। अब निगाहें CCL प्रबंधन और पुलिस प्रशासन पर हैं। क्या विस्थापितों को उनका वास्तविक अधिकार मिलेगा या उनके नाम पर कथित वसूली का नया खेल शुरू होगा? पिपरवार की इस परियोजना में इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में बेहद महत्वपूर्ण होगा।
वर्जन
सीसीएल हमेशा से विस्थापितों के लिए कटिबद्ध होकर काम करती रही है। रोड सेल के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि विस्थापितों को उनका अधिकार मिले उनकी जीवन शैली में सुधार हो। कोल डंप कमिटी या अन्य संगठनों पर भी नजर रहेगी कि इस परियोजना में किसी तरह की गैरकानूनी हरकत ना की जाए। संबंधित पदाधिकारियों को निर्देश जारी किए जा रहे हैं साथ ही स्थानीय पुलिस को भी सूचना दी जाएगी ताकि विस्थापितों के हक और अधिकार की आड़ में काला खेल ना हो सके।
सुजीत कुमार सिन्हा
GM पिपरवार
ट्रक ऑनर्स एसोसिएशन का दायित्व है कि ऐसे परियाजनाओं में खास तौर पर विस्थापितों को ध्यान में रखकर काम किया जाए। हमलोग पूरी पारदर्शिता के साथ काम करने का प्रयास कर रहे हैं और किसी भी तरह की गैरकानूनी या अवैध वसूली को रोकना हमारा भी दायित्व है। अगर ट्रक ऑनर्स एसोसिएशन की आड़ में कोई गैर कानूनी कार्य होगा तो ऐसे लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
ललित ओझा
अध्यक्ष, ट्रक ऑनर्स एसोसिएशन
