रांची। देशभर में शुक्रवार को विभाजन की विभीषिका स्मृति दिवस मनाया गया। इसी क्रम में रांची में भी कार्यक्रम आयोजित कर वर्ष 1947 में हुए देश के विभाजन के दौरान झेली गई त्रासदी और विस्थापन के दर्द को याद किया गया। कार्यक्रम का आयोजन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के क्षेत्रीय कार्यालय और रांची विश्वविद्यालय के संयुक्त सहयोग से किया गया।
कार्यक्रम के दौरान स्कूली बच्चों ने पदयात्रा निकाली। इसके जरिए विभाजन के दौरान लोगों द्वारा झेले गए दर्द, विस्थापन और सामाजिक त्रासदी की स्मृतियों को याद किया गया। कार्यक्रम स्थल पर विभाजन की विभीषिका से जुड़ी चित्र प्रदर्शनी भी लगाई गई। प्रदर्शनी का उद्घाटन रांची विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. सरोज शर्मा ने किया।
विभाजन की स्मृतियों पर हुआ व्याख्यान
स्मृति दिवस के अवसर पर व्याख्यान कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। इसमें विभाजन के प्रत्यक्षदर्शी पद्मश्री बलबीर दत्त ने 1947 के दौर की घटनाओं और उस समय के सामाजिक माहौल को याद किया।
बलबीर दत्त ने कहा कि विभाजन की विभीषिका को याद रखना जरूरी है, ताकि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियां इतिहास से सबक ले सकें। उस दौर में ब्रिटिश हुकूमत की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति प्रभावी हुई और धार्मिक आधार पर तनाव तथा दंगों का माहौल बढ़ता गया। इसके बाद देश के विभाजन का रास्ता तैयार हुआ और भारत तथा पाकिस्तान दो अलग-अलग देशों के रूप में अस्तित्व में आए।
विभाजन के दौरान लाखों लोगों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा और बड़ी संख्या में परिवार विस्थापित हुए। उनके अनुसार, इस त्रासदी की स्मृति को लंबे समय तक सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा नहीं बनाया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2021 से 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया, ताकि विभाजन के दौरान पीड़ित परिवारों और विस्थापितों के दर्द को याद किया जा सके।
धर्म के आधार पर हुआ देश का विभाजन
कार्यक्रम में रांची विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. सरोज शर्मा ने भी विभाजन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि यूरोप के कई देशों का गठन भाषा और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर हुआ, लेकिन भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ। उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों और लॉर्ड माउंटबेटन की नीतियों को भी विभाजन की प्रक्रिया से जोड़कर देखा।
इतिहास के इस अध्याय को केवल अतीत की घटना के रूप में नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सीख के रूप में समझने की जरूरत है।
युवाओं में हो ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना
कार्यक्रम में रामकृष्ण मिशन आश्रम के सचिव स्वामी भवेशानंद ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि देश की सभ्यता लंबे समय से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना पर आधारित रही है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक भारत को आत्मनिर्भर और विश्व में मजबूत भूमिका निभाने वाले राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के लिए युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। युवाओं में सबसे पहले ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना होनी चाहिए।
कार्यक्रम में पदयात्रा, चित्र प्रदर्शनी और व्याख्यान के माध्यम से विभाजन की त्रासदी को याद किया गया। आयोजन का उद्देश्य नई पीढ़ी को इतिहास के उस दर्दनाक दौर से परिचित कराना और उससे सीख लेते हुए भविष्य में सामाजिक एकता एवं सद्भाव को मजबूत करने का संदेश देना रहा।
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