Wednesday, September 9

संयुक्त राष्ट्र महासभा में दुनिया का नक्शा दिखाने के तरीके को बदलने से जुड़े प्रस्ताव के बाद भारत ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, लेकिन साथ ही साफ कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख समेत भारत के पूरे क्षेत्र को उसके आधिकारिक नक्शे के अनुसार ही दिखाया जाना चाहिए। भारत की सीमाएं अटल हैं और इनके गलत या भ्रामक चित्रण को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

क्षेत्रफल बदलने वाला नहीं है नया नक्शा

दरअसल, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर को ऐसे नक्शे को बढ़ावा देने वाले प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसमें दुनिया के देशों और महाद्वीपों का आकार उनके वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात के करीब दिखे। इस बदलाव से किसी देश की जमीन, क्षेत्रफल या अंतरराष्ट्रीय सीमा में कोई परिवर्तन नहीं होगा। केवल पृथ्वी को सपाट नक्शे पर दिखाने का तरीका बदलेगा।

भारत ने इसी उद्देश्य वाले प्रस्ताव का समर्थन किया है। हालांकि, विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रस्ताव को किसी खास नक्शे, प्रोजेक्शन या देशों की सीमाओं की स्वीकृति के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

भारत की आपत्ति किस बात पर है?

भारत की मुख्य चिंता उसके संप्रभु क्षेत्र के सही चित्रण को लेकर है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक जम्मू-कश्मीर और लद्दाख सहित भारत का पूरा क्षेत्र आधिकारिक भारतीय नक्शे के अनुरूप ही दिखाया जाना चाहिए। भारत के क्षेत्र का कोई भी गलत या भ्रामक चित्रण स्वीकार्य नहीं होगा।

इसका मतलब यह है कि नया मैपिंग सिस्टम अपनाए जाने के बावजूद भारत की वास्तविक सीमाएं और क्षेत्रफल पूरी तरह वही रहेंगे।

मर्केटर मैप में क्यों दिखता है फर्क?

दुनिया में लंबे समय से मर्केटर प्रोजेक्शन का इस्तेमाल होता रहा है। इसे 1569 में यूरोपीय कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर ने तैयार किया था। समुद्री नेविगेशन के लिए यह बेहद उपयोगी था, लेकिन इसमें भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्रों का आकार वास्तविकता से काफी बड़ा दिखाई देता है।

ग्रीनलैंड इसका प्रमुख उदाहरण है। मर्केटर नक्शे में यह दक्षिण अमेरिका के करीब-करीब बराबर नजर आता है, जबकि वास्तविक क्षेत्रफल में दक्षिण अमेरिका उससे कई गुना बड़ा है। इसी तरह अफ्रीका का वास्तविक आकार भी मर्केटर नक्शे में कम दिखाई देता है।

अफ्रीकी देशों की पहल

नए नक्शे की मांग के पीछे अफ्रीकी देशों की बड़ी भूमिका रही है। उनका तर्क है कि नक्शे केवल भूगोल समझने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे दुनिया के प्रति लोगों की सोच को भी प्रभावित करते हैं। इक्वल एरिया प्रोजेक्शन में अफ्रीका जैसे महाद्वीप अपने वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाई देते हैं।

क्या सभी जगह पुराना नक्शा खत्म हो जाएगा?

संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। इसका मतलब है कि देश, स्कूल, प्रकाशक या टेक कंपनियां अपनी पसंद के अनुसार अलग-अलग मैप प्रोजेक्शन का इस्तेमाल कर सकती हैं। मर्केटर प्रोजेक्शन भी पूरी तरह खत्म नहीं होगा, खासकर नेविगेशन जैसे क्षेत्रों में इसका उपयोग जारी रह सकता है।

कुल मिलाकर, दुनिया के नक्शे को दिखाने का तरीका बदल सकता है, लेकिन भारत की सीमाएं, क्षेत्रफल और संप्रभुता में कोई बदलाव नहीं होगा। भारत ने इसी बात को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है कि नक्शे में उसके क्षेत्र का चित्रण आधिकारिक भारतीय नक्शे के अनुरूप ही होना चाहिए।

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