Wednesday, October 14

धनबाद और गोविंदपुर में तैनात रहे चार निबंधन अधिकारियों को झारखंड हाईकोर्ट से मिली राहत को महज एक सेवा-विवाद के रूप में देखना भूल होगी। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने जिस आधार पर संतोष कुमार, सुजीत कुमार, मिहिर कुमार और श्वेता कुमारी के खिलाफ चार्ज मेमो रद्द किए हैं, वह फैसला राज्य के पूरे निबंधन और राजस्व प्रशासन के लिए एक स्पष्ट संदेश है — जिम्मेदारी तय करने से पहले यह देखना जरूरी है कि कानून किसे, कितना अधिकार और दायित्व देता है।

असल सवाल: गलती किसकी थी?

मामले की जड़ में सात अगस्त 2020 की एक शिकायत थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि 2017 से 2020 के बीच निबंधित कई दस्तावेजों में जमीन के पुराने और नये सर्वे खाता-प्लॉट नंबर आपस में मेल नहीं खाते थे। जांच के बाद विभाग ने मान लिया कि यह चूक निबंधन अधिकारियों की लापरवाही है। लेकिन हाईकोर्ट ने इस मान्यता को ही सिरे से खारिज कर दिया।

अदालत ने रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 21 और सुप्रीम कोर्ट के के. गोपी बनाम सब-रजिस्ट्रार मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि निबंधन अधिकारी की भूमिका दस्तावेज को प्रक्रिया के अनुसार निबंधित करने तक सीमित है, न कि यह तय करने तक कि जमीन बेचने वाले व्यक्ति का उस पर वास्तविक मालिकाना हक है या नहीं। यानी जिस काम के लिए अफसरों को दोषी ठहराया गया, वह काम कानूनन उनके दायरे में आता ही नहीं था।

इससे एक बड़ा सवाल खड़ा होता है: अगर चारों अफसर वास्तव में गलती के लिए जिम्मेदार नहीं थे, तो जांच समिति और विभाग ने आरंभ में यह भेद क्यों नहीं किया कि खाता-प्लॉट मिलान अंचल कार्यालय और राजस्व रिकॉर्ड का विषय है, निबंधन कार्यालय का नहीं? यह चूक आगे भी दोहराई जा सकती है, जब तक निबंधन और राजस्व विभाग के बीच जिम्मेदारियों की रेखा स्पष्ट न हो।

तीन से पांच साल की देरी — सजा से पहले ही सजा

फैसले का दूसरा और शायद ज्यादा दूरगामी पहलू है कार्यवाही में हुई देरी। शिकायत और अधिकारियों के जवाब 2020 में ही आ चुके थे, फिर भी चार्ज मेमो 2023 और 2025 में, यानी तीन से पांच साल बाद जारी किए गए। अदालत ने इस देरी के लिए कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण न मिलने पर विभाग को स्पष्ट रूप से कठघरे में खड़ा किया।

यह अकेला मामला नहीं है। राज्य सरकार के विभागों में विभागीय कार्यवाही के लंबित रहने और वर्षों बाद अचानक चार्ज मेमो जारी होने की शिकायतें लंबे समय से रही हैं। ऐसे मामलों में कर्मचारी सालों तक अनिश्चितता में रहते हैं — प्रोन्नति रुकती है, मानसिक दबाव बना रहता है, और अंततः जब मामला अदालत तक पहुंचता है तो अक्सर देरी को ही आधार बनाकर राहत मिल जाती है। सवाल यह है कि क्या विभाग इस फैसले से सबक लेकर आंतरिक जांच प्रक्रियाओं को समयबद्ध बनाएंगे, या यह एक और फैसला बनकर फाइलों में दब जाएगा।

जमीन खरीदारों के लिए भी संदेश

इस फैसले का एक व्यावहारिक असर आम जमीन खरीदारों और विक्रेताओं पर भी पड़ता है। अदालत ने दोहराया कि यदि दस्तावेज की सभी प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं पूरी हैं और तय स्टांप शुल्क तथा निबंधन शुल्क जमा है, तो निबंधन अधिकारी केवल टाइटल को लेकर संदेह के आधार पर निबंधन से इनकार नहीं कर सकता। इसका मतलब यह भी है कि जमीन की सत्यता और मालिकाना हक की जिम्मेदारी अंततः खरीदार, विक्रेता और उनके वकीलों की ही रहती है — निबंधन कार्यालय की मुहर इस बात की गारंटी नहीं देती कि जमीन का टाइटल विवादरहित है।

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