Tuesday, October 13

केन्द्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार झारखंड अब नक्सलमुक्त
झारखंड डिजीटल ने चाईबासा से आखिरी तीन नक्सलियों के सरेंडर के साथ किया था खुलासा

करीब चार दशकों तक राज्य के जंगलों, पहाड़ियों और सुदूर गांवों में अपने पैर जमाए रखने वाले ‘लाल आतंक’ (वामपंथी उग्रवाद/नक्सलवाद) का अब लगभग सफाया हो चुका है. 1980 के दशक से जो इलाके उग्रवाद के काले साए में जी रहे थे, वहां इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पूरी शान, सम्मान और आजादी की सांसों के साथ राष्ट्रध्वज तिरंगा लहराएगा. भारतीय स्वतंत्रता दिवस की 80वीं वर्षगांठ से पहले चाईंबासा से तीन खूंखार नक्सलियों सलूका कायम, पिंकी और कोदूमुनी के सरेंडर के साथ राज्य का आखिरी नक्सलग्रस्त जिला चाईंबासा नक्सलमुक्त हो गया. झारखंड डीजिटल ने तीनों नक्सलियों के सरेंडर की खबर 7 अगस्त को सबसे पहले आपतक पहुंचाई और साथ ही पूर्व की रिपोर्ट के अनुसार यह भी खुलासा किया कि चाईंबासा अब नक्सल मुक्त हो गया है. यह झारखंड के लिए एक ऐतिहासिक और राहत भरी खबर है और यह बदलाव केवल एक प्रशासनिक या सैन्य जीत नहीं है, बल्कि उन लाखों ग्रामीणों, आदिवासियों और सुरक्षाबलों के समर्पण का परिणाम है, जिन्होंने दशकों तक इस लाल आतंक का दंश झेला है.

लाल आतंक का इतिहास और झारखंड का दर्द

1980 के दशक के उत्तरार्ध और 1990 के दशक की शुरुआत में संयुक्त बिहार (जिसमें वर्तमान झारखंड शामिल था) के सारंडा, बूढ़ा पहाड़, पारसनाथ, झुमरा और चतरा-लातेहार के सीमावर्ती इलाकों में नक्सलवाद ने अपनी जड़ें मजबूत करना शुरू किया था. वर्ष 2000 में झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद भी नक्सली हिंसा राज्य की सबसे बड़ी समस्या बनी रही.एक समय ऐसा था जब राज्य के 24 में से 21 से अधिक जिले नक्सल प्रभावित माने जाते थे. नक्सलियों ने सुदूर इलाकों में अपनी ‘जन अदालतें’ बनाईं और प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह से ठप कर दिया.

विकास पर ब्रेक और दहशत का साया

नक्सलियों के आतंक का ऐसा आलम था कि सड़कें, पुल, स्कूल भवन और अस्पताल तक या तो बनने नहीं दिए जाते थे या उन्हें बम से उड़ा दिया जाता था. राष्ट्रीय त्योहारों (15 अगस्त और 26 जनवरी) पर नक्सली संगठन ‘काला दिवस’ मनाने का फरमान जारी करते थे और गांवों में काला झंडा फहराने का दबाव बनाते थे. हालात इतने भयाभह थे कि नक्सलग्रस्त इलाकों में पुलिस भी जाने से कतराती थी और स्थानीय लोग यह भूल चुके थे कि वह आजाद भारत में सांस ले रहे हैं.

कैसे संभव हुआ ‘लाल आतंक’ से छुटकारा?

झारखंड को इस भयावह दौर से बाहर निकालने में सुरक्षाबलों की रणनीतिक योजना, केंद्र व राज्य सरकार की नीति और आधुनिक तकनीक का सबसे बड़ा योगदान रहा.

1. सुरक्षाबलों का आक्रामक और सुनियोजित अभियान

झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ (CRPF), कोबरा (CoBRA) बटालियन और झारखंड जगुआर ने मिलकर नक्सलियों के गढ़ में घुसकर अभियान चलाया. बूढ़ा पहाड़ की मुक्ति (ऑपरेशन ऑक्टोपस): छत्तीसगढ़ सीमा पर स्थित ‘बूढ़ा पहाड़’ दशकों से सीपीआई (माओवादी) का शीर्ष गढ़ और राष्ट्रीय मुख्यालय जैसा माना जाता था. सुरक्षाबलों ने दुर्गम पहाड़ियों पर कैंप स्थापित कर इस इलाके को पूरी तरह नक्सलियों से मुक्त कराया. एशिया के सबसे घने साल के जंगलों में शुमार सारंडा और गिरिडीह के पारसनाथ इलाके से भी नक्सलियों के शीर्ष कैडरों को खदेड़ दिया गया.

2. फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOB) की स्थापना

सुरक्षा रणनीति में सबसे बड़ा बदलाव आया सुदूर इलाकों में ‘फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस’ की स्थापना से। सुरक्षाबलों ने केवल सर्च ऑपरेशन चलाकर वापस लौटने के बजाय नक्सलियों के मुख्य कोर एरिया में स्थायी कैंप बना दिए. इससे नक्सलियों का सप्लाई नेटवर्क टूट गया और उनका जनाधार समाप्त हो गया.

3. आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति

सरकार की लचीली और आकर्षक आत्मसमर्पण नीति ने नक्सलियों के निचले और मध्य स्तर के कैडरों को मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित किया. ‘नई दिशा’ जैसी योजनाओं के तहत दर्जनों इनामी नक्सलियों ने हथियार डाले और सामान्य जीवन जीने का रास्ता चुना.

बंदूकों के साए से बाहर ‘नया झारखंड’

नक्सलवाद के खात्मे का सीधा असर राज्य के सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य पर दिखाई दे रहा है. जिन इलाकों में ठेकेदार और मजदूर जाने से डरते थे, वहां आज पक्की सड़कें, मोबाइल टावर और बिजली की लाइनें बिछाई जा चुकी हैं. नक्सलियों द्वारा ध्वस्त किए गए दर्जनों स्कूल भवनों का पुनर्निर्माण कराया गया है. बच्चे अब बिना किसी खौफ के कलम थाम रहे हैं. नेतरहाट, बूढ़ा घघ, सारंडा और पारसनाथ जैसे सुरम्य स्थल जो कभी उग्रवाद का केंद्र थे, अब पर्यटकों के लिए सुरक्षित और आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं।

15 अगस्त: आजादी की नई भोर

इस बार का स्वतंत्रता दिवस झारखंड के लिए अत्यंत विशेष है. राज्य के वे क्षेत्र, जहां पिछले 40 सालों से 15 अगस्त को सन्नाटा पसरा रहता था या जहां डर के मारे लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकलते थे, वहां इस बार मुख्य समारोह आयोजित किए जा रहे हैं. हालांकि मुख्यधारा के माओवादी संगठन लगभग पस्त हो चुके हैं, लेकिन राज्य में शांति को स्थायी बनाए रखने के लिए अभी भी सतर्कता आवश्यक है. नक्सलवाद के दोबारा पनपने को रोकने के लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि जंगलों और पहाड़ियों में रहने वाले आदिवासियों तक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी रुकावट के पहुंचे. सुरक्षाबलों और स्थानीय जनता के बीच बना विश्वास का रिश्ता ही इस शांति की सबसे मजबूत नींव है.

यह पल याद रखिएगा क्योंकि आने वाली नस्लें सवाल भी पूछेंगी

झारखंड का ‘लाल आतंक’ से मुक्त होकर तिरंगे के रंगों में रंगना भारत की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में एक सुनहरे अध्याय की तरह है. इस स्वतंत्रता दिवस पर जब झारखंड के कोने-कोने में राष्ट्रगान गूंजेगा और तिरंगा हवा में लहराएगा, तो वह केवल एक झंडा फहराने की रस्म नहीं होगी—वह जीत होगी विकास की, लोकतंत्र की और उन आम नागरिकों के अटूट विश्वास की, जिन्होंने कभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा.

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