खूंटी: सरकारी आवास की उम्मीद में एक आदिवासी परिवार ने 13 साल गुजार दिए, लेकिन आज तक उसके सिर पर पक्की छत नहीं बन सकी। हर बार आश्वासन मिला, मगर परिवार की रहने की स्थिति नहीं बदली। खूंटी जिले के सिलादोन गांव में किसान रतनू मुंडा का परिवार आज भी चट्टान पर बनी जर्जर झोपड़ी में रहने को मजबूर है। बारिश होते ही घर की छत से पानी टपकने लगता है और परिवार की मुश्किलें बढ़ जाती हैं।
बिरहू पंचायत के सिलादोन गांव से करीब आधा किलोमीटर दूर स्थित इस झोपड़ी की हालत बेहद खराब है। छत पर लगी प्लास्टिक कई जगह से फट चुकी है। दीवारों में दरारें हैं और घर के अंदर इतनी जगह भी नहीं है कि परिवार आराम से रह सके। एक ही छोटे कमरे में खाना बनाने से लेकर सोने और सामान रखने तक का काम होता है। कुछ सामान को चट्टान पर प्लास्टिक से ढककर रखा गया है।
परिवार का कहना है कि वर्ष 2013 से ही सरकारी आवास के लिए लगातार आवेदन किया जा रहा है। इस दौरान कई बार संबंधित अधिकारियों से गुहार लगाई गई, लेकिन हर बार आश्वासन ही मिला।
मौसम खराब होने और बारिश के दौरान स्थिति और भी मुश्किल हो जाती है। प्लास्टिक की छत से पानी टपकने के कारण घर के अंदर रहना मुश्किल हो जाता है। चक्रवाती तूफान ‘अर्नब’ के प्रभाव से हो रही बारिश ने परिवार की चिंता और बढ़ा दी है। परिवार को डर है कि तेज बारिश और हवा के बीच जर्जर झोपड़ी में रहना किसी बड़ी परेशानी का कारण बन सकता है।
13 साल बीत गए, लेकिन परिवार की जिंदगी उसी जर्जर झोपड़ी में सिमटी हुई है। फिर भी उम्मीद टूटी नहीं है। परिवार आज भी इस आस में है कि एक दिन उनकी भी सुनवाई होगी, सरकारी आवास योजना का लाभ मिलेगा और चट्टान पर बनी इस झोपड़ी की जगह एक पक्का मकान बनेगा।
अब देखना ये है की सरकार आखिर कब तक एक गरीब परिवार को पक्की छत के लिए इंतजार करवाएगी और जिम्मेदार अधिकारियों तक रतनू मुंडा की गुहार कब तक पहुंचेगी?
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