रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने अपने दो नाबालिग बेटों की हत्या के मामले में दोषी ठहराई गई शमा परवीन की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें महिला को दोनों बच्चों की हत्या के लिए सश्रम आजीवन कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। जुर्माना नहीं देने की स्थिति में छह महीने की अतिरिक्त साधारण कैद का प्रावधान भी बरकरार रखा गया है।
यह फैसला 6 अगस्त 2026 को झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सुनाया। पीठ में जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय और जस्टिस अरुण कुमार राय शामिल थे। मामला Shama Parveen v. State of Jharkhand, Criminal Appeal से जुड़ा है।
2013 में सामने आया था मामला
मामला 19 मई 2013 की रात का है। अभियोजन के अनुसार, शमा परवीन अपने दो बेटों – चार वर्षीय कासिफ उमर और दो वर्षीय सारिफ उमर – को लेकर एक व्यक्ति मंजूर आलम के घर गई थी। रात में वह बच्चों के साथ घर वापस नहीं लौटी।
अगली सुबह शमा को सड़क किनारे बदहवास हालत में बैठे होने की जानकारी उसके पति को मिली। इसके बाद बच्चों की तलाश शुरू हुई। कुछ ही समय बाद दोनों बच्चों के शव एक नाले से बरामद किए गए। दोनों शव कपड़े में लिपटे हुए थे।
पोस्टमार्टम में जहरीला पदार्थ देने की बात सामने आई
मामले की जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बच्चों की मौत को जहर दिए जाने से जोड़ा गया। एक बच्चे के शरीर पर कई धारदार हथियार से किए गए कट के निशान भी पाए गए थे।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि जांच के दौरान खून लगी ब्लेड और चूड़ियों की बरामदगी का साक्ष्य सामने आया। अदालत ने यह भी नोट किया कि बच्चों को जिस कपड़े में लपेटकर नाले में छोड़ा गया था, वह कपड़ा आरोपी महिला की साड़ी से मेल खाता था।
दूसरे व्यक्ति से संबंध को लेकर अभियोजन की कहानी
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, शमा परवीन के मंजूर आलम के साथ कथित संबंध थे और मंजूर आलम उससे शादी करना चाहता था। आरोप था कि दोनों बच्चों को इस रिश्ते में बाधा माना जा रहा था और इसी वजह से बच्चों की हत्या की गई।
हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि शमा परवीन ने अपने बयान में इस बात का उल्लेख किया था कि मंजूर आलम उससे शादी करना चाहता था। हालांकि, उसने अभियोजन की कहानी से इनकार करते हुए हत्या का जिम्मेदार मंजूर आलम को बताया था।
आरोपी महिला ने खुद को बचाने के लिए क्या दलील दी?
अपील की सुनवाई के दौरान शमा परवीन की ओर से अधिवक्ता अरविंद कुमार चौधरी ने तर्क दिया कि मामला प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य पर आधारित नहीं है और अभियोजन का पूरा केस परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर टिका है।
बचाव पक्ष का दावा था कि बच्चों की हत्या मंजूर आलम ने की थी और शमा खुद घटना के बाद सदमे की स्थिति में सड़क पर मिली थी। महिला ने यह भी कहा था कि वह मंजूर आलम के घर बच्चों को लेकर उससे अपना कर्ज वापस लेने गई थी।
महिला ने अपने बचाव में अदालत के सामने यह भी कहा कि बच्चों को जबरन पेप्सी पिलाई गई थी।
हाईकोर्ट ने क्यों नहीं माना बचाव पक्ष का दावा?
हाईकोर्ट ने महिला के बयान को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि उसका बयान पोस्टमार्टम में सामने आए जहरीले पदार्थ के तथ्य से मेल खाता है, लेकिन कोर्ट के अनुसार यह बयान खुद को अपराध से अलग दिखाने के उद्देश्य से दिया गया प्रतीत होता है।
अदालत ने यह भी पाया कि अभियोजन की ओर से पेश किए गए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी आरोपी महिला की संलिप्तता की ओर इशारा करती है। कोर्ट ने कहा कि महिला बच्चों को लेकर मंजूर आलम के घर गई थी और इसके बाद दोनों बच्चों की हत्या हुई तथा शव नाले से बरामद हुए।
नौ गवाहों में अधिकांश हो गए थे होस्टाइल
इस मामले में अभियोजन की ओर से नौ गवाहों की गवाही कराई गई थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में नोट किया कि इनमें से अधिकांश गवाह अपने पहले के बयानों से पीछे हट गए और होस्टाइल हो गए थे।
हालांकि, अदालत ने पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर के साक्ष्य के अलावा दो अन्य महत्वपूर्ण गवाहों, जिनमें आरोपी महिला का पति भी शामिल था, की गवाही को महत्वपूर्ण माना। इसी के साथ बरामदगी और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को भी अदालत ने अपने फैसले में महत्व दिया।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
मामले की परिस्थितियों पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने अपराध को गुप्त, क्रूर और वीभत्स बताया। अदालत ने कहा कि महिला मां होने के नाते अपने बच्चों की रक्षा करने के बजाय उनकी हत्या में शामिल रही।
पीठ ने यह भी कहा कि आरोपी महिला की ओर से ऐसा कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया, जिससे घटना की कोई दूसरी विश्वसनीय संभावना सामने आती हो। अदालत के अनुसार, मामले के सभी महत्वपूर्ण परिस्थितिजन्य तथ्य आरोपी की संलिप्तता की ओर एक ही दिशा में इशारा करते हैं।
2021 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट ने रखा बरकरार
ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2021 में शमा परवीन को IPC की धारा 302 सहपठित धारा 34 के तहत दोषी ठहराते हुए सश्रम आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। महिला ने इस फैसले को चुनौती देते हुए झारखंड हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
अब हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है। इस तरह महिला की उम्रकैद और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा बरकरार है।
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