Wednesday, September 9

झारखंड में लगातार हो रही बारिश का असर अब देश की बिजली व्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। राज्य के प्रमुख कोयला क्षेत्रों में भारी बारिश के कारण उत्पादन और कोयले की ढुलाई प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर देश के थर्मल पावर प्लांटों पर पड़ा है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के 4 सितंबर के आंकड़ों के मुताबिक, देश के 57 कोयला आधारित बिजलीघर क्रिटिकल स्टॉक की स्थिति में पहुंच गए हैं। कई बिजलीघरों में केवल चार से पांच दिनों के लिए कोयला बचा है।

सामान्य जरूरत का सिर्फ 47 प्रतिशत कोयला उपलब्ध

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के आंकड़ों के अनुसार, इन 57 बिजलीघरों में करीब 27.1 मिलियन टन कोयला उपलब्ध है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में इनकी जरूरत करीब 57.7 मिलियन टन होती है। यानी बिजलीघरों में उपलब्ध कोयला सामान्य आवश्यकता का महज 47 प्रतिशत रह गया है। करीब 30.6 मिलियन टन की कमी बताई जा रही है।

बढ़ी बिजली की मांग ने बढ़ाया दबाव

एक कोयला कंपनी के अधिकारी के अनुसार, जनवरी से मार्च के बीच बिजलीघरों में पर्याप्त कोयला स्टॉक मौजूद था। इस कारण कई बिजलीघरों ने कोयले की मांग कम कर दी थी। इसके बाद कुछ राज्यों में बारिश कम होने से घरेलू, औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों में बिजली की मांग बढ़ी। मांग बढ़ने के साथ ही बिजलीघरों को अधिक कोयले की जरूरत पड़ने लगी।

मानसून में खदानों से लेकर रैक तक प्रभावित

लगातार बारिश के कारण कोयला खदानों में उत्पादन और परिवहन दोनों प्रभावित होते हैं। बारिश से कोयला सीम गीली और चिपचिपी हो जाती हैं। निचले इलाकों की खदानों में पानी भरने से उत्पादन प्रभावित होता है। वहीं, खदानों की आंतरिक सड़कों पर जलजमाव के कारण कोयले की ढुलाई भी धीमी पड़ जाती है।

अब रोज 1.7 मिलियन टन कोयला भेजने की कोशिश

स्थिति को देखते हुए कोयला मंत्रालय ने झारखंड समेत सभी कोयला कंपनियों को बिजलीघरों की आपूर्ति बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। फिलहाल बिजलीघरों को करीब 1.7 मिलियन टन कोयला प्रतिदिन भेजा जा रहा है, जबकि पहले यह मात्रा करीब 1.2 से 1.4 मिलियन टन थी। कोल इंडिया ने भी फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट वाले बिजलीघरों को तय वार्षिक मात्रा से अधिक कोयला उठाने की अनुमति देने की पहल की है।

झारखंड से जुड़े बिजलीघरों पर भी संकट

झारखंड में 25 अगस्त से 2 सितंबर तक हुई भारी बारिश का असर कोयला रैक की संख्या पर भी पड़ा। CCL के CMD निलेंदु कुमार सिंह के मुताबिक, इस दौरान बिजलीघरों को करीब 25 रैक प्रतिदिन ही भेजे जा पा रहे थे। अब इसमें सुधार होकर करीब 40 रैक भेजे जा रहे हैं और इसे बढ़ाकर 46 रैक तक करने का लक्ष्य है।

राजस्थान, यूपी और पंजाब में भी चिंता

क्षेत्रवार स्थिति में उत्तरी भारत के बिजलीघरों पर ज्यादा दबाव है। राजस्थान के सभी सात थर्मल पावर प्लांट क्रिटिकल स्टॉक की स्थिति में हैं। उत्तर प्रदेश के सात बिजलीघरों में भी कोयले की कमी है। इनमें चार को झारखंड की कोयला कंपनियों से आपूर्ति मिलती है। पंजाब के राजपुरा और तलवंडी साबो पावर प्लांटों में भी केवल पांच से छह दिनों का कोयला बचा है। CEA के मानकों के अनुसार, जब किसी थर्मल पावर प्लांट में उसकी सामान्य जरूरत का 25 प्रतिशत से कम कोयला बचता है, तो उसे क्रिटिकल श्रेणी में रखा जाता है। 4 सितंबर तक 57 बिजलीघर इस श्रेणी में थे, जिनमें 52 घरेलू कोयले, चार आयातित कोयले और एक वॉशरी रिजेक्ट कोयले पर आधारित था।

एक बार मुख्य आंकड़े पर नजर डाले

क्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट : 57
घरेलू कोयले पर आधारित : 52
आयातित कोयले पर आधारित : 4
वॉशरी रिजेक्ट आधारित : 1
उपलब्ध कोयला : 27.1 मिलियन टन
सामान्य जरूरत : 57.7 मिलियन टन
उपलब्धता : करीब 47 प्रतिशत
कमी : करीब 30.6 मिलियन टन
झारखंड से कोयला पाने वाले प्रमुख क्रिटिकल बिजलीघर
महात्मा गांधी विद्युत संयंत्र, हरियाणा : सीसीएल
हरदुआगंज टीपीएस, उत्तर प्रदेश : बीसीसीएल और सीसीएल
जवाहरपुर एसटीपीएस, उत्तर प्रदेश : बीसीसीएल और सीसीएल
टांडा टीपीएस, उत्तर प्रदेश : सीसीएल
पनकी टीपीएस, उत्तर प्रदेश : सीसीएल
नबीनगर पावर प्लांट, बिहार : सीसीएल
पतरातू एसटीपीएस : सीसीएल

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