Wednesday, September 9

किसी छात्र का करियर दांव पर लगाकर बिना मान्यता के कोर्स चलाना अब मेडिकल कॉलेजों को भारी कीमत चुका सकता है। झारखंड हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में सख्त रुख अपनाते हुए महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज (एमजीएम), जमशेदपुर को एक छात्र को 46 लाख रुपये से अधिक की राशि लौटाने का आदेश दिया है। जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने साफ कहा कि जब कोर्स की मान्यता ही नहीं है, तो उसके आधार पर भरवाया गया बांड कानूनन प्रभावी नहीं रह सकता।

बिना मान्यता के कोर्स में मिला था दाखिला

मामला 2019-21 सत्र के डीएमआरडी-रेडियोलाजी कोर्स से जुड़ा है। एमबीबीएस पास याचिकाकर्ता ने नीट-पीजी 2019 पास करने के बाद काउंसिलिंग में एमजीएम कॉलेज की सीट स्वीकार की थी। दाखिले के वक्त कॉलेज ने उससे 30 लाख रुपये का बांड भरवाया और मूल प्रमाणपत्र भी अपने पास रख लिए। बाद में छात्र को पता चला कि कोर्स को एमसीआइ की मान्यता ही नहीं थी और विभाग में जरूरी शिक्षक-सुविधाएं भी नहीं थीं। प्रमाणपत्र वापस न मिलने से वह नई सीट पर दाखिला नहीं ले सका और 2021 में दोबारा परीक्षा देकर संजय गांधी पीजीआई, लखनऊ पहुंचा।

MRI तक नहीं, सीटी स्कैन भी खराब

कोर्ट ने कॉलेज की व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी की कि रेडियोलाजी पीजी कोर्स चलाने वाले संस्थान के पास MRI मशीन तक नहीं थी और सीटी स्कैन मशीन भी काम नहीं कर रही थी। अदालत ने इसे छात्रों के साथ धोखा करार दिया।

एमसीआइ और काउंसिलिंग एजेंसी की भूमिका पर भी सवाल

हाई कोर्ट ने तत्कालीन मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया पर भी सवाल उठाए कि उसने कॉलेज के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की। कोर्ट ने काउंसिलिंग संस्था से भी पूछा कि बिना मान्यता वाले कोर्स की सिफारिश कैसे हुई।

आदेश का सार

अदालत ने एमजीएम कॉलेज को 39,94,645 रुपये लौटाने के साथ करियर के दो वर्ष बर्बाद होने के एवज में सात लाख रुपये अतिरिक्त मुआवजा देने का निर्देश दिया है।

इसे भी पढ़े – Coal Crisis : बारिश ने बढ़ाई बिजली की टेंशन! 57 थर्मल पावर प्लांट में कोयले का संकट

 

 

Share.
Next Story
JSSC-CGL के 99 कर्मचारियों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, नियुक्ति रद्द करने के सरकारी आदेश पर रोक
Exit mobile version