Tuesday, September 22

कौन है नवल…जेल में बंद भीखन गंझू पर किसकी है नजर

भाकपा-माओवादी से अलग होकर ब्रजेश ने खड़ा किया टेरर नेटवर्क

आम्रपाली और मगध कोल प्रोजेक्ट से वसूले करोड़ों रुपये

एनआईए और झारखंड पुलिस को वर्षों से थी तलाश

​झारखंड के कोयलांचल में दहशत का दूसरा नाम

 

​झारखंड का चतरा, लातेहार और पलामू क्षेत्र वर्षों से उग्रवाद और आपराधिक गतिविधियों की गवाही देता रहा है। लेकिन इस इलाके में कानून-व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा नाम रहा था ब्रजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह भोक्ता। तृतीय प्रस्तुति कमेटी (TPC/TSPC) का सुप्रीमो और केंद्रीय समिति का शीर्ष नेता ब्रजेश गंझू केवल एक उग्रवादी कमांडर नहीं है, बल्कि वह झारखंड के सबसे अमीर और नेटवर्क वाले लेवी (रंगदारी) साम्राज्य का मास्टरमाइंड माना जाता है। भाकपा-माओवादी (CPI-Maoist) से अलग होकर बने इस संगठन ने राज्य के चतरा-लातेहार-पलामू बेल्ट पर अपना एकछत्र प्रभाव स्थापित किया और कोयला कारोबारियों, ठेकेदारों तथा ट्रांसपोर्टरों से करोड़ों रुपये की लेवी वसूल कर अपना शिकंजा कसा और उसके बाद झारखंड से सटे सीमावर्ती जिलों तक अपनी पैठ बना दी। इस बात की जानकारी खुफिया एजेंसियों को भी थी और आईबी के साथ साथ राज्य पुलिस का खुफिया विभाग लागातार उसके पीछे लगा हुआ था।

 

कौन है नवल.. जो संभाल सकता है झारखंड, बिहार, बंगाल और उड़ीसा तक फैला टेरर नेटवर्क

टीएसपीसी सूप्रीमो की तलाश पुलिस करती रही लेकिन वह हाल के कुछ वर्षों से जैसे भूत बन गया था। जानकार बताते हैं कि अधिकांश समय वह चतरा जिला में ही रहकर झारखंड, बिहार, बंगाल और उड़ीसा तक अपना नेटवर्क फैलाता रहा। इस काम में उसको सबसे ज्यादा सहयोग राज्य के बाहर की उन कंपनियों के संचालक करते रहे जिनकी कंपनी चतरा और लातेहार में कोयला लिफ्टिंग का काम करती है। टीएसपीसी सूत्रों की मानें तो ब्रजेश के बाद उसके सबसे खासमखास नवल का नाम सामने आ रहा है जिसको जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। इसके अलावा जेल में बंद भीखन गंझू भी काफी सक्रिय है लेकिन संगठन में भीखन को लेकर कई तरह के विरोध भी हैं। कुल मिलाकर मानें तो इस पूरे खेल की अगली कमान नवल को सौंपी जा सकती है। पुलिस के लिए बड़ा सवाल है कि नवल आखिर है कौन …लेकिन सूत्रों की मानें तो नवल को ब्रजेश के हर ठिकाने और व्यवसायियों की लिस्ट की जानकारी है और अगली कमान वही संभाल सकता है।

 

भाकपा-माओवादी से अलग होकर खड़ा किया TPC

​मूल रूप से भाकपा-माओवादी संगठन के खिलाफ विद्रोह करके बने गुट के रूप में तृतीय प्रस्तुति कमेटी (टीपीसी) का उदय हुआ। इस संगठन की कमान ब्रजेश गंझू के हाथों में आई और उसने देखते ही देखते संगठन को न केवल मजबूत सशस्त्र बल में बदला, बल्कि वित्तीय रूप से बेहद शक्तिशाली बना दिया। टीपीसी ने अपने प्रभाव का विस्तार करने के लिए झारखंड के सबसे बड़े कोयला खनन क्षेत्रों—टंडवा के आम्रपाली और मगध कोल प्रोजेक्ट—को निशाना बनाया। यहां कोयला ट्रांसपोर्टरों, लिफ्टरों, डीओ (Delivery Order) होल्डरों और स्थानीय ठेकेदारों से जबरन वसूली का एक पूरा तंत्र विकसित किया गया।

लेवी का विशाल नेटवर्क और करोड़ों की नकदी बरामदगी

​सुरक्षा एजेंसियों और जांच रिपोर्टों के अनुसार, टंडवा क्षेत्र में टीपीसी का रंगदारी नेटवर्क किसी कॉर्पोरेट कंपनी की तरह चलाया जाता था। इसके लिए स्थानीय स्तर पर “मगध संचालन समिति” और “आम्रपाली समिति” जैसी कमेटियों का गठन किया गया था। इन कमेटियों का मुख्य काम कोयला कारोबार से जुड़े हर छोटे-बड़े व्यक्ति से लेवी वसूलना था। वर्ष 2016 में टंडवा थाना में दर्ज कांड संख्या 02/2016 के तहत हुई जांच में चौंकाने वाले खुलासे हुए। जांच में पाया गया कि इन समितियों द्वारा जुटाई गई लेवी की रकम सीधे टीपीसी सुप्रीमो ब्रजेश गंझू तक पहुंचाई जाती थी, जो बाद में संगठन के अन्य कैडर और शीर्ष उग्रवादियों में बांटी जाती थी।

​छापेमारी के दौरान पुलिस ने अभूतपूर्व नकदी बरामद की थी:

​बिनोद कुमार गंझू के ठिकाने से लगभग ₹91.75 लाख नकद बरामद हुए थे।

​प्रदीप राम के ठिकाने से करीब ₹57.58 लाख की लेवी राशि जब्त की गई थी।

​इस मामले की गंभीरता, हथियार कानून, आपराधिक साजिश और गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज धाराओं के कारण, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने इस केस (RC-06/2018/NIA/DLI) को अपने हाथ में लिया।

30 लाख रुपये का इनाम और सुरक्षा एजेंसियों की बड़ी चुनौती

​ब्रजेश गंझू की गिरफ्तारी सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी। वह वर्षों से भूमिगत रहकर अपने नेटवर्क का संचालन करता रहा। ​उसकी गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने उस पर भारी-भरकम इनाम की घोषणा भी कर दी लेकिन ब्रजेश हाथ नहीं लगा। झारखंड पुलिस ने जहां उसपर ₹25 लाख का इनाम रखा वहीं राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने ₹5 लाख का इनाम घोषित कर दिया। कुल मिलाकर ₹30 लाख के इनामी इस उग्रवादी सुप्रीमो की तलाश में एनआईए, झारखंड पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की संयुक्त टीमें लगातार चतरा, लातेहार और आसपास के जंगलों में छापेमारी करती रही।

 

​संगठन का मजबूत ढांचा और अन्य आरोपी

​एनआईए की चार्जशीट और पुलिस फाइलों के अनुसार, ब्रजेश गंझू का संगठन सिर्फ अकेला काम नहीं करता, बल्कि इसमें कई प्रमुख सहयोगी और कमांडर शामिल रहे हैं:

​मुकेश गंझू

​कोहराम

​आक्रमण उर्फ रवींद्र गंझू

​अनिश्चय गंझू

​भीखन गंझू / दीपू सिंह

​बिंदु गंझू

​इन सभी सहयोगियों पर कोयलांचल में आतंक फैलाने, हथियार सप्लाई करने और अवैध धन के लेन-देन में शामिल होने के गंभीर आरोप हैं।

जुलाई 2026 में ब्रजेश के गिरफ्तारी की अफवाहें थी या कोई खेल…

​जुलाई 2026 के आसपास ब्रजेश गंझू के चतरा में पकड़े जाने की खबरें मीडिया में तेजी से फैली थीं। हालांकि, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई थी। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, ब्रजेश गंझू को इनकाउंटर से पहले तक फरार (Absconding) और वांटेड की सूची में शामिल दिखाया गया है। एनआईए और राज्य पुलिस की ओर से उसे पकड़ने के प्रयास जारी रहे इसी बीच रविवार को ब्रजेश गंझू की उत्तर प्रदेश में पुलिस के साथ इनकाउंटर में मौत हो गयी। अरबों के लेवी नेटवर्क का साम्राज्य चलाने वाला ब्रजेश मोटरसाइकिल पर पुलिस को मिला और मुठभेड़ में मार गिराया गया। हालांकि, ब्रजेश के भाई गणेश गंझू का दावा है कि चतरा से उठाकर ब्रजेश को उत्तर प्रदेश में इनकाउंटर किया गया है।

 

​झारखंड के उग्रवाद इतिहास में ब्रजेश गंझू का प्रभाव

​झारखंड में वामपंथी उग्रवाद (LWE) के इतिहास में ब्रजेश गंझू का नाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने उग्रवाद को केवल राजनीतिक या विचारधारा की लड़ाई से हटाकर एक समानांतर वित्तीय और आपराधिक नेटवर्क में बदल दिया। चतरा-टंडवा-लातेहार-पलामू कॉरिडोर में उसका प्रभाव इस बात का सबूत है कि कैसे कोयला खनन क्षेत्रों का आर्थिक दोहन उग्रवादी संगठनों की रीढ़ की हड्डी बनता है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय के पदाधिकारी यह अच्छे से जानते हैं कि चतरा लातेहार में कोयला पर लगाम लगाने के लिए ब्रजेश का मरना जरुरी था। सुरक्षा बलों के लिए ब्रजेश गंझू को सलाखों के पीछे पहुंचाना या मार गिराना न केवल टीपीसी की कमर तोड़ने के लिए जरूरी था, बल्कि राज्य के सबसे महत्वपूर्ण कोयलांचल क्षेत्र में शांति और पारदर्शी व्यापार बहाल करने के लिए भी बेहद आवश्यक लक्ष्य था।

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