Friday, October 2

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका और चुनाव आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग के नाम पर ऐसे फैसले लिए गए, जिनमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंजूरी या भागीदारी नहीं थी।

याचिका में मूल सवाल यह उठाया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को मिली सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले कर सकते हैं। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने क्वो वारंटो रिट जारी करने की मांग की है, ताकि सीईसी से उन शक्तियों के इस्तेमाल का कानूनी आधार पूछा जा सके।

चुनाव आयोग के कामकाज पर क्या है याचिका का दावा?

भारत निर्वाचन आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। मौजूदा समय में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त हैं, जबकि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी चुनाव आयुक्त हैं।

याचिका में दावा किया गया है कि 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 ऐसे मामलों पर आपत्ति दर्ज की, जिनमें उनके अनुसार आयोग की मंजूरी के बिना उसके नाम पर कदम उठाए गए थे।

याचिकाकर्ता ने इसे चुनाव आयोग की शक्तियों के  “धीरे-धीरे केंद्रीकरण” से जोड़ते हुए कई प्रक्रियात्मक सवाल उठाए हैं। इनमें आयोग की बैठकों के एजेंडे और कार्यवृत्त जारी करने में देरी या उनका उपलब्ध नहीं होना, मतदाता सूची से जुड़ी प्रक्रियाओं में बदलाव और दोनों चुनाव आयुक्तों की जानकारी या मंजूरी के बिना अपील दायर किए जाने जैसे आरोप शामिल हैं।

2023 के कानून का भी दिया गया हवाला

याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 का भी उल्लेख किया गया है। याचिका के अनुसार, आयोग को जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से काम करना चाहिए। अगर किसी मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद होता है, तो फैसला बहुमत के आधार पर किया जाना है।

इसी प्रावधान के आधार पर याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि अगर किसी फैसले में आयोग के दूसरे सदस्यों की भागीदारी नहीं है, तो उसे पूरे चुनाव आयोग का फैसला किस आधार पर माना जा सकता है।

मतदाता सूची को लेकर क्यों गंभीर है मामला?

याचिका में मतदाता सूची से जुड़े फैसलों को खास तौर पर महत्वपूर्ण बताया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि मतदाता सूची में बदलाव सीधे इस बात को प्रभावित करता है कि कौन मतदाता के रूप में शामिल होगा और किसे मतदान का अधिकार मिलेगा।

इसी वजह से याचिका में यह संवैधानिक सवाल उठाया गया है कि चुनाव संबंधी ऐसी महत्वपूर्ण शक्तियों का इस्तेमाल उसी बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था के जरिए होना चाहिए, जिसकी स्थापना संविधान ने चुनावों के संचालन के लिए की है।

SIR की प्रक्रिया को भी चुनौती

याचिका का एक अहम हिस्सा विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़ा है। इसमें SIR के तहत की गई कार्रवाइयों, फैसलों, निर्देशों और उनसे जुड़े दूसरे कदमों को चुनौती दी गई है।

याचिकाकर्ता ने मांग की है कि अगर यह पाया जाता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने 2023 के कानून की धारा 18 के तहत आयोग के उचित सामूहिक फैसले के बिना उसकी शक्तियों का इस्तेमाल किया, तो ऐसे फैसलों और शक्तियों के इस्तेमाल को कानूनी रूप से अमान्य घोषित किया जाए। साथ ही SIR से जुड़े कदमों को भी शुरू से ही शून्य और बिना कानूनी अधिकार के घोषित करने की मांग की गई है।

क्वो वारंटो के जरिए मांगा गया अधिकार का आधार

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से क्वो वारंटो जारी करने की मांग का मकसद यही है कि मुख्य चुनाव आयुक्त से यह स्पष्ट कराया जाए कि उन्होंने किन संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के तहत उन शक्तियों का इस्तेमाल किया, जिन्हें याचिकाकर्ता चुनाव आयोग की सामूहिक शक्ति मानता है।

फिलहाल ये सभी आरोप और दावे याचिका में लगाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अब इन कानूनी और संवैधानिक सवालों पर विचार होना है।

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