Monday, September 21

मुजफ्फरनगर: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में तैनात अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर अपने एक फैसले को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने किसी आपराधिक मामले के आरोपी की सजा को लेकर नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था के भीतर प्रशासनिक फैसलों को लेकर सवाल उठाए हैं। एक पुराने एनडीपीएस मामले में फैसला सुनाते हुए उन्होंने पूछा कि अगर किसी न्यायाधीश के साथ ही अन्याय हो जाए तो वह अपनी बात आखिर कहां रखे?

न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने अपने फैसले में यह सवाल भी उठाया कि जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करने वाला कोई न्यायाधीश क्या ऐसे आदेश का पालन करने के लिए बाध्य है, जो उसकी नजर में कानून के प्रावधानों के विपरीत हो। यह टिप्पणी उनकी अदालत से बड़ी संख्या में हत्या के मामलों की पत्रावलियां वापस लिए जाने के संदर्भ में सामने आई है।

97 हत्या के मामलों की पत्रावलियां वापस लेने पर सवाल

रिपोर्टों के मुताबिक, 18 अगस्त 2026 को तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश बीरेंद्र कुमार सिंह के आदेश के बाद रवि कुमार दिवाकर की अदालत से हत्या के 97 मामलों की पत्रावलियां वापस ले ली गई थीं। इन मामलों को वापस लेने के आदेश में कारणों को स्पष्ट रूप से दर्ज किए जाने को लेकर जज दिवाकर ने सवाल उठाया है।

उन्होंने अपने फैसले में न्यायिक मामलों को एक अदालत से दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और कारण दर्ज करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि खासकर गंभीर आपराधिक मामलों की फाइल यदि प्रशासनिक स्तर पर वापस ली जाती है या दूसरी अदालत को भेजी जाती है, तो उसके पीछे की वजह रिकॉर्ड में स्पष्ट होनी चाहिए।

‘सिर्फ अधिकार होना पर्याप्त नहीं’

जज दिवाकर ने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल जिम्मेदारी और जवाबदेही के साथ होना चाहिए। उनके अनुसार किसी अधिकारी के पास कोई शक्ति होना अपने आप में उस शक्ति के किसी भी तरीके से इस्तेमाल को उचित नहीं ठहराता।

फैसले में न्यायिक प्रशासन से जुड़े मामलों में कारणयुक्त आदेश और पारदर्शिता की जरूरत पर भी चर्चा की गई। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई प्रशासनिक आदेश कानून के दायरे से बाहर हो, तो क्या अधीनस्थ न्यायिक अधिकारी उसके पालन के लिए बाध्य है?

10-12 साल पुराने एनडीपीएस मामले में आरोपी दोषमुक्त

यह टिप्पणी जिस मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई, वह चरस बरामदगी से जुड़ा पुराना एनडीपीएस मामला था। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों की जांच के बाद आरोपी अशोक भारती को दोषमुक्त कर दिया। रिपोर्टों के अनुसार अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सका।

अदालत ने आपराधिक मामलों में स्थापित सिद्धांत के तहत अभियोजन पक्ष के लिए आरोपों को संदेह से परे साबित करना जरूरी माना। पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के बाद आरोपी को राहत दी गई।

23 लोगों को फांसी की सजा सुनाने के बाद चर्चा में आए थे

रवि कुमार दिवाकर नवंबर 2025 में मुजफ्फरनगर में तैनात हुए थे। इसके बाद उनकी अदालत ने कुछ ही महीनों में हत्या के 11 मामलों में 23 दोषियों को मौत की सजा सुनाई। इसी वजह से वह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए थे। अब 97 मामलों की पत्रावलियां वापस लिए जाने और उस पर उनके द्वारा फैसले में की गई टिप्पणी ने न्यायिक प्रशासन को लेकर बहस को फिर सामने ला दिया है।

जज दिवाकर की टिप्पणी को फिलहाल उनके फैसले में दर्ज न्यायिक एवं प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़े सवालों के रूप में देखा जा रहा है। 97 मामलों को वापस लेने के प्रशासनिक निर्णय के पीछे क्या कारण थे, इस पर संबंधित पक्षों की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने पर तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।

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