रक्षाबंधन आते ही घरों में राखी, मिठाई और पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधने के साथ उसका तिलक करती हैं, आरती उतारती हैं और फिर भाई की लंबी उम्र व सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। लेकिन इस पूरी रस्म में एक छोटी-सी चीज ऐसी है, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं जाता – तिलक के ऊपर लगाए जाने वाले चावल के दाने।
आखिर तिलक लगाने के बाद चावल ही क्यों लगाया जाता है? क्या इसके पीछे सिर्फ परंपरा है या इसका कोई धार्मिक अर्थ भी है? हिंदू मान्यताओं में चावल को ‘अक्षत’ कहा जाता है और रक्षाबंधन की पूजा में इसका विशेष महत्व बताया गया है। इस साल रक्षाबंधन 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। आइए पंडित राकेश झा के बताए अनुसार समझते हैं कि भाई को तिलक और अक्षत लगाने की परंपरा का क्या अर्थ है और इस दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
तिलक के बाद अक्षत लगाने के पीछे क्या मान्यता है?
हिंदू धार्मिक परंपरा में तिलक को शुभता, मंगल और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। माथे के बीच का स्थान भी धार्मिक मान्यताओं में विशेष महत्व रखता है। इसी स्थान पर तिलक लगाकर भाई के सुखद और मंगलमय जीवन की कामना की जाती है।
लेकिन तिलक के ऊपर चावल लगाने का अपना अलग महत्व है। अक्षत का शाब्दिक अर्थ है—जो टूटा या खंडित न हो। इसलिए पूरे चावल के दाने को अखंडता और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है।
रक्षाबंधन पर भाई के माथे पर अक्षत लगाने की मान्यता को इसी भावना से जोड़ा जाता है कि भाई-बहन का रिश्ता हमेशा अटूट रहे और भाई के जीवन में सुख, समृद्धि और दीर्घायु बनी रहे।
चावल को क्यों माना जाता है शुभ?
भारतीय धार्मिक परंपराओं में चावल को समृद्धि और शुभता से जोड़कर देखा जाता है। पूजा-पाठ में भी अक्षत का इस्तेमाल लंबे समय से होता आया है।
मान्यता के अनुसार, तिलक को भगवान विष्णु से और अक्षत को देवी लक्ष्मी से जोड़ा जाता है। यानी तिलक और अक्षत के माध्यम से भाई के जीवन में मंगल, समृद्धि और सुख-शांति की कामना की जाती है।
यही वजह है कि रक्षाबंधन की रस्म में चावल महज एक सामान्य सामग्री नहीं, बल्कि शुभ आशीर्वाद के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।
तिलक और अक्षत लगाने का सही क्रम क्या है?
रक्षाबंधन की रस्म में भी क्रम का विशेष ध्यान रखने की बात कही जाती है।
सबसे पहले भाई को पूजा की चौकी या उचित स्थान पर बैठाकर उसके माथे पर तिलक लगाएं। इसके बाद तिलक के ऊपर अक्षत लगाएं। फिर भाई की आरती उतारकर उसकी कलाई पर राखी बांधी जाती है।
इसके बाद बहन भाई की सुख-समृद्धि और लंबी उम्र की कामना करती है। भाई भी बहन की रक्षा और हर परिस्थिति में उसका साथ देने का संकल्प लेता है।
सूखे चावल सीधे तिलक पर लगाने से क्यों किया जाता है मना?
धार्मिक परंपराओं में अक्षत को पूजा के लिए तैयार करने का भी महत्व बताया गया है। इसलिए कुछ मान्यताओं के अनुसार, तिलक पर सीधे सूखे चावल लगाने के बजाय अक्षत को हल्का गीला करके इस्तेमाल करना उचित माना जाता है।
इसी वजह से पूजा की थाली में रखे चावल को तिलक पर लगाने से पहले थोड़ा गीला किया जाता है।
अक्षत का दाना टूटा हुआ नहीं होना चाहिए
‘अक्षत’ का अर्थ ही है—अखंड और बिना टूटा हुआ। इसलिए रक्षाबंधन की पूजा में भी पूरे चावल के दाने इस्तेमाल करने की परंपरा बताई जाती है।
टूटे या खंडित चावल को अक्षत नहीं कहा जाता। इसलिए पूजा की थाली तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखा जा सकता है कि चावल के दाने साबुत हों।
तिलक लगाते समय इन बातों का भी रखें ध्यान
- राखी बांधने से पहले भाई के माथे पर तिलक और अक्षत लगाने की परंपरा है।
- तिलक के बाद अक्षत और फिर राखी बांधने का क्रम रखा जाता है।
- धार्मिक मान्यता के अनुसार अक्षत के लिए साबुत चावल का इस्तेमाल करना चाहिए।
- चावल को सीधे सूखे रूप में लगाने के बजाय हल्का गीला करके इस्तेमाल करने की परंपरा है।
- तिलक करते समय भाई के सिर पर रुमाल या साफ कपड़ा रखने की बात भी कुछ परंपराओं में कही गई है।
- बहन के लिए भी सिर पर दुपट्टा या कपड़ा रखना शुभ माना जाता है।
सिर्फ एक रस्म नहीं, रिश्ते के लिए मंगलकामना है अक्षत
रक्षाबंधन पर भाई के माथे पर तिलक और अक्षत लगाने की रस्म देखने में भले ही छोटी लगे, लेकिन इसके पीछे भाई के लिए मंगलकामना और भाई-बहन के रिश्ते की मजबूती का भाव जुड़ा हुआ है। तिलक शुभता का प्रतीक है तो अक्षत उस रिश्ते की अखंडता और समृद्धि की कामना का प्रतीक माना जाता है।
यही वजह है कि राखी बांधने से पहले की यह छोटी-सी रस्म आज भी रक्षाबंधन की पारंपरिक पूजा का अहम हिस्सा बनी हुई है।
इसे भी पढ़े – किराए के घर में वास्तु दोष से हैं परेशान? बिना तोड़फोड़ अपनाएं ये आसान उपाय, घर में बनी रहेगी पॉजिटिविटी


