सोचिए… एक ऐसा स्कूल जहां बच्चों की आंखों में पढ़-लिखकर आगे बढ़ने के सपने हैं, लेकिन उन सपनों को आकार देने के लिए सिर्फ एक शिक्षक मौजूद है। पांच कक्षाएं, 111 बच्चे और जिम्मेदारी सिर्फ एक शिक्षक की। झारखंड की राजधानी रांची से करीब 200 किलोमीटर दूर लातेहार जिले के अम्बाटांड़ गांव में शिक्षा व्यवस्था की एक ऐसी तस्वीर सामने आती है, जो सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी की गंभीर स्थिति को दिखाती है।
अम्बाटांड़ के उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय में पहली से पांचवीं कक्षा तक कुल 111 बच्चे पढ़ते हैं। लेकिन इन बच्चों की पढ़ाई से लेकर स्कूल की तमाम जिम्मेदारियों को संभालने के लिए सिर्फ एक शिक्षक हैं श्यामदेव उरांव। ऐसे में शिक्षक के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह पांचों कक्षाओं के बच्चों को किस तरह पढ़ाएं और हर विद्यार्थी पर पर्याप्त ध्यान कैसे दें।
एक शिक्षक के भरोसे पांच कक्षाएं
स्कूल में शिक्षक श्यामदेव उरांव की दिनचर्या बच्चों के आने के साथ ही शुरू हो जाती है। वह स्कूल में मौजूद टैब को अपने मोबाइल से कनेक्ट कर अपनी हाजिरी दर्ज करते हैं। इसके बाद बच्चों की संख्या और उपस्थिति से जुड़े काम पूरे किए जाते हैं और फिर पढ़ाई शुरू होती है। सबसे बड़ी चुनौती तब सामने आती है, जब एक ही शिक्षक को एक साथ अलग-अलग कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाना पड़ता है। सीमित जगह और शिक्षक की कमी के कारण एक कमरे में दो या उससे अधिक कक्षाओं के बच्चों को बैठाकर पढ़ाया जाता है। एक तरफ पहली कक्षा के बच्चों को शुरुआती शिक्षा देनी होती है, वहीं दूसरी तरफ पांचवीं कक्षा के विद्यार्थियों की पढ़ाई भी जारी रखनी होती है।
पढ़ाई के साथ दूसरी जिम्मेदारियां भी
श्यामदेव उरांव की जिम्मेदारी सिर्फ बच्चों को पढ़ाने तक सीमित नहीं है। स्कूल में बच्चों के लिए मिड डे मील की व्यवस्था और उसकी निगरानी, जरूरी रिकॉर्ड तैयार करना तथा दूसरे प्रशासनिक काम भी उन्हें ही संभालने पड़ते हैं। यानी एक ही शिक्षक को शिक्षक के साथ-साथ स्कूल की कई दूसरी जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी जिम्मेदारियों के बीच बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय और ध्यान आखिर कितना मिल पाता होगा।
झारखंड में हजारों स्कूल एकल-शिक्षक व्यवस्था के भरोसे
शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक झारखंड में 9,827 प्राथमिक स्कूल ऐसे हैं, जहां सिर्फ एक शिक्षक तैनात है। अम्बाटांड़ का स्कूल इसी बड़ी समस्या की एक जमीनी तस्वीर सामने रखता है। 111 बच्चों और पांच कक्षाओं की जिम्मेदारी एक शिक्षक के कंधों पर होना सिर्फ व्यवस्था की चुनौती नहीं, बल्कि उन बच्चों के भविष्य से जुड़ा सवाल भी है। बच्चों की आंखों में बेहतर भविष्य का सपना है, लेकिन उस सपने तक पहुंचने के लिए उन्हें पर्याप्त शिक्षक और संसाधन मिलना भी उतना ही जरूरी है।
अम्बाटांड़ की यह कहानी सवाल छोड़ जाती है जब एक शिक्षक पर पांच कक्षाओं और 111 बच्चों की जिम्मेदारी होगी, तो हर बच्चे को उसके हिस्से की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आखिर कैसे मिल पाएगी?
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