Thursday, September 24

25 सितंबर को मनाई जाएगी अनंत चतुर्दशी, इसी दिन गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन भी; 14 गांठों वाले अनंत सूत्र की है विशेष धार्मिक मान्यता

रांची: सनातन हिंदू धर्म में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी या अनंत चौदस के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी। खास बात यह है कि इसी दिन देश के कई हिस्सों में गणेशोत्सव का समापन भी होगा और श्रद्धालु भगवान गणेश की प्रतिमाओं का विधि-विधान से विसर्जन करेंगे। यानी जिस दिन गणपति बप्पा को विदाई दी जाएगी, उसी दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा का पर्व भी मनाया जाएगा।

अनंत चतुर्दशी का धार्मिक महत्व भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप से जुड़ा है। ‘अनंत’ का अर्थ है जिसका न आदि है और न अंत। इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु के अनंत रूप की आराधना कर परिवार में सुख, शांति, समृद्धि, आरोग्य और अखंड मंगल की कामना करते हैं। कई स्थानों पर इस अवसर पर व्रत रखने और अनंत सूत्र धारण करने की परंपरा भी निभाई जाती है।

गणेश विसर्जन और अनंत चतुर्दशी का विशेष संयोग

गणेशोत्सव के दौरान भगवान गणेश की स्थापना के बाद अलग-अलग परंपराओं के अनुसार उनकी प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। अनंत चतुर्दशी का दिन गणेशोत्सव के समापन के प्रमुख दिनों में से एक माना जाता है। यही वजह है कि इस दिन धार्मिक गतिविधियां और उत्सवी माहौल दोनों एक साथ देखने को मिलते हैं।

सुबह से जहां श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा की तैयारी करते हैं, वहीं दूसरी ओर गणेश मंडपों में विसर्जन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। ढोल-नगाड़ों, भजन-कीर्तन और जयकारों के बीच श्रद्धालु गणेश प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाते हैं। इस तरह एक ही दिन भगवान गणेश की विदाई और भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना का अवसर आता है।

14 गांठों वाला अनंत सूत्र क्यों है खास?

अनंत चतुर्दशी की पूजा में अनंत सूत्र धारण करने की परंपरा विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह सूत्र सामान्यतः कच्चे सूत से तैयार किया जाता है और इसमें 14 गांठें लगाई जाती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार ये 14 गांठें चौदह लोकों का प्रतीक मानी जाती हैं।

पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालु इस सूत्र को अपनी भुजा पर धारण करते हैं। मान्यता है कि अनंत सूत्र भगवान के प्रति श्रद्धा, विश्वास, संकल्प और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा का प्रतीक है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसे धारण करने की विधि और परंपरा में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है।

कौंडिन्य ऋषि और सुशीला से जुड़ी है व्रत-कथा

अनंत चतुर्दशी से जुड़ी प्रसिद्ध व्रत-कथा ऋषि कौंडिन्य और उनकी पत्नी सुशीला से संबंधित है। लोकमान्यता के अनुसार सुशीला ने अनंत भगवान का व्रत और पूजन कर अनंत सूत्र धारण किया था। इसके बाद उनके परिवार में सुख-समृद्धि आई।

कहा जाता है कि बाद में कौंडिन्य ऋषि ने अनंत सूत्र की महत्ता को समझे बिना उसका अनादर कर दिया। इसके बाद उन्हें अनेक कठिनाइयों और कष्टों का सामना करना पड़ा। अंततः उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान अनंत की श्रद्धापूर्वक आराधना की। भगवान की कृपा से उनके कष्ट दूर हुए।

यह कथा श्रद्धालुओं को श्रद्धा, विश्वास, संयम और ईश्वर के प्रति समर्पण का संदेश देती है।

कैसे की जाती है अनंत भगवान की पूजा?

अनंत चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु का ध्यान करते हैं। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई कर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। पुष्प, फल, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित कर भगवान अनंत की पूजा की जाती है।

पूजा के दौरान श्रद्धालु भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप का स्मरण करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा मंगल की कामना करते हैं। पूजा पूरी होने के बाद अनंत सूत्र धारण किया जाता है। कई श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार इस दिन व्रत भी रखते हैं।

आस्था के साथ संकल्प का पर्व

अनंत चतुर्दशी को केवल सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा पर्व नहीं माना जाता, बल्कि यह सत्य, संयम, सदाचार और कर्तव्य के प्रति संकल्प का भी संदेश देता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जीवन की परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन व्यक्ति को अपने धर्म, आस्था और अच्छे कर्मों के प्रति दृढ़ रहना चाहिए।

इस वर्ष 25 सितंबर को गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन और अनंत चतुर्दशी का एक साथ पड़ना इस दिन को और भी खास बना रहा है। एक ओर श्रद्धालु भावुक होकर गणपति बप्पा को विदाई देंगे, वहीं दूसरी ओर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा कर परिवार और समाज के मंगल की कामना करेंगे। यही धार्मिक आस्था और उत्सव का संगम अनंत चतुर्दशी को विशेष बनाता है।

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