झारखंड उच्च न्यायालय ने तथ्य छिपाकर और अदालत के साथ धोखाधड़ी कर पक्ष में फैसला हासिल करने के एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. न्यायमूर्ति राजेश शंकर की एकल पीठ ने अवमानना याचिका (Cont. Case (Civil) No.1010 of 2025) का निपटारा करते हुए मूल याचिकाकर्ता महादेव उरांव को 12 लाख रुपये का जुर्माना भरने का आदेश दिया है.
क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ता महादेव उरांव ने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) के तहत अपनी जमीन (हेहल अंचल, रतू रोड, रांची स्थित 45 डिसमिल जमीन) की वापसी के लिए वर्ष 1993 से लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी थी. हाई कोर्ट तक उसके हक में फैसला आने के बाद, उसने अंचलाधिकारी (CO) को जमीन का कब्जा वापस दिलाने के लिए निर्देश देने की मांग करते हुए 2024 में एक रिट याचिका दायर की. अदालत ने 22 अक्टूबर 2024 को उसके पक्ष में आदेश जारी कर दिया था. इसके बाद आदेश का पालन न होने पर अवमानना याचिका दायर की गई.
अदालत के सामने कैसे खुला मामला?
अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान विपक्षी पक्ष (12 लोग, जो उस जमीन पर रह रहे थे) ने अदालत में हस्तक्षेप याचिका दाखिल की. उन्होंने साक्ष्य पेश किए कि वर्ष 2019 से 2020 के बीच याचिकाकर्ता ने उनसे कुल ₹1.08 करोड़ रुपये लेकर जमीन के लिए 11 समझौतों (Settlement Agreements) पर हस्ताक्षर किए थे.
याचिकाकर्ता ने रिट याचिका दायर करते समय इन समझौतों और पैसे लेने की बात को कोर्ट से पूरी तरह छिपाया था
खबर के प्रमुख बिंदु (Highlights)
धोखाधड़ी से प्राप्त आदेश ‘शून्य’ (Nullity): अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता ने मुख्य तथ्यों को छिपाकर अदालत को गुमराह किया. इस कारण 22 अक्टूबर 2024 को जारी किया गया पुराना आदेश कानून की नज़र में अमान्य/शून्य घोषित कर दिया गया.
भारी जुर्माना (Exemplary Cost):
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता महादेव उरांव के इस आचरण पर सख्त रुख अपनाते हुए उसे सभी 12 प्रभावित पक्षों (Opposite Party Nos. 3 to 14) को 1-1 लाख रुपये (कुल 12 लाख रुपये) का जुर्माना 4 सप्ताह के भीतर देने का निर्देश दिया है.
हेहल CO को कड़ी चेतावनी
अदालत ने हेहल अंचल के अंचलाधिकारी (CO) घनश्याम कुमार के रवैये की भी कड़ी निंदा की है.CO ने बिना स्पष्ट आदेश के जमीन पर बने ढांचों (Structures) को गिराने की कोशिश की थी. कोर्ट ने उन्हें भविष्य में अदालत के आदेशों का पालन करते समय सतर्क रहने की चेतावनी दी.
कोर्ट की टिप्पणी
”धोखाधड़ी सब कुछ नष्ट कर देती है”: सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि जो पक्ष अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग करता है या सच छिपाता है, वह किसी भी राहत का हकदार नहीं है. कोर्ट ने दोनों पक्षों को जमीन के अधिकार, टाइटल और हित को लेकर कानून के तहत उचित कानूनी रास्ता अपनाने की छूट भी दी है.
