कोयला मंत्रालय ने जारी की नीलामी की संशोधित कार्यप्रणाली, भूमिगत खनन करने वाली कंपनियों को अग्रिम भुगतान से भी मिलेगी पूरी छूट; लेकिन ओपनकास्ट खनन में बदलाव की नहीं होगी अनुमति
नई दिल्ली। देश में कोयला उत्पादन बढ़ाने और भूमिगत खनन को प्रोत्साहित करने के लिए केंद्र सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। कोयला मंत्रालय ने व्यावसायिक इस्तेमाल और बिक्री के लिए कोयला खदानों और ब्लॉकों की नीलामी से जुड़ी संशोधित कार्यप्रणाली जारी की है। 30 अक्टूबर 2026 को मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर जारी इस दस्तावेज में खदानों की नीलामी और कंपनियों को मिलने वाली वित्तीय रियायतों से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं।

इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा उन कंपनियों को मिल सकता है, जो भूमिगत तरीके से कोयला निकालने की योजना बना रही हैं। सरकार ने ऐसी खदानों के लिए न्यूनतम रेवेन्यू शेयर की दर 4 प्रतिशत से घटाकर 2 प्रतिशत कर दी है। इतना ही नहीं, इन खदानों को हासिल करने वाली कंपनियों को अग्रिम भुगतान यानी अपफ्रंट अमाउंट जमा करने से भी पूरी छूट देने का प्रावधान किया गया है।
सरकार का मानना है कि इन रियायतों से भूमिगत खनन में निवेश करने वाली कंपनियों पर शुरुआती आर्थिक बोझ कम होगा और वे इस क्षेत्र में आगे आने के लिए प्रोत्साहित होंगी।
क्या है सरकार का नया फैसला?
कोयला मंत्रालय की संशोधित नीलामी कार्यप्रणाली के तहत भूमिगत खनन के लिए विशेष रूप से चिह्नित कोयला और लिग्नाइट खदानों को आर्थिक राहत दी गई है।
दरअसल, सामान्य तौर पर किसी कोयला खदान की नीलामी में कंपनियां सरकार को होने वाली कमाई में अपनी हिस्सेदारी यानी रेवेन्यू शेयर की दर बताती हैं। इस प्रक्रिया में अधिक बोली लगाने वाली कंपनी को खदान आवंटित करने का प्रावधान है।
लेकिन भूमिगत खनन के मामले में सरकार ने अलग व्यवस्था की है। मंत्रालय के 23 अप्रैल 2025 के आदेश के अनुसार, जिन खदानों को नीलामी के टेंडर दस्तावेज में विशेष रूप से भूमिगत खनन के लिए निर्धारित किया गया है, उनके लिए न्यूनतम रेवेन्यू शेयर की दर 4 प्रतिशत से घटाकर 2 प्रतिशत कर दी गई है।
इसका सीधा मतलब है कि ऐसी खदानों के लिए कंपनियों को पहले की तुलना में कम न्यूनतम राजस्व हिस्सेदारी का प्रावधान मिलेगा।
अग्रिम भुगतान भी नहीं करना होगा
सरकार की इस नई व्यवस्था में दूसरी बड़ी राहत अग्रिम भुगतान को लेकर है।
आमतौर पर कोयला खदान की नीलामी में सफल होने वाली कंपनी को निर्धारित शर्तों के अनुसार सरकार को अग्रिम राशि जमा करनी पड़ती है। यह राशि खदान हासिल करने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।
लेकिन भूमिगत खनन के लिए विशेष रूप से निर्धारित खदानों के मामले में सफल बोलीदाता को इस अग्रिम भुगतान से पूरी छूट देने का प्रावधान किया गया है।
इसका उद्देश्य कंपनियों की शुरुआती निवेश लागत को कम करना है। भूमिगत खनन में जमीन के नीचे सुरंग, मशीनों, सुरक्षा व्यवस्था और तकनीकी संसाधनों पर काफी खर्च करना पड़ता है। ऐसे में अग्रिम भुगतान की बाध्यता हटने से कंपनियों को अपनी पूंजी खनन की तैयारी और जरूरी सुविधाओं पर खर्च करने का अवसर मिल सकता है।
ओपनकास्ट खनन में नहीं बदल सकेंगी कंपनियां
सरकार ने भूमिगत खनन को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक रियायतें तो दी हैं, लेकिन इसके साथ एक महत्वपूर्ण शर्त भी रखी है।
इसके मुताबिक, जिस कंपनी को भूमिगत खनन के लिए निर्धारित शर्तों पर कोयला या लिग्नाइट की खदान आवंटित की जाएगी, वह खदान के पूरे जीवनकाल में खनन की पद्धति नहीं बदल सकेगी।
यानी कंपनी बाद में उस खदान को ओपनकास्ट या मिश्रित खनन में परिवर्तित नहीं कर पाएगी।
इसे आसान भाषा में समझें तो सरकार किसी कंपनी को भूमिगत खनन के नाम पर विशेष आर्थिक छूट देगी, तो कंपनी को पूरी परियोजना में भूमिगत खनन की शर्त का पालन करना होगा। वह बाद में अधिक उत्पादन या दूसरे व्यावसायिक फायदे के लिए खुले तरीके से खनन शुरू नहीं कर सकेगी।
क्या होता है भूमिगत और ओपनकास्ट खनन?
कोयला निकालने के मुख्य रूप से दो तरीके हैं। पहला भूमिगत खनन और दूसरा ओपनकास्ट खनन।
भूमिगत खनन: इस तरीके में जमीन के नीचे मौजूद कोयले तक पहुंचने के लिए सुरंगें बनाई जाती हैं। इसके बाद मशीनों और तकनीकी उपकरणों की मदद से कोयला निकाला जाता है। यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण होती है और इसमें सुरक्षा तथा शुरुआती निवेश पर विशेष ध्यान देना पड़ता है।
ओपनकास्ट खनन: इसमें जमीन की ऊपरी परत को हटाकर कोयले तक पहुंचा जाता है। इसके बाद बड़ी मशीनों की मदद से कोयला निकाला जाता है। इसमें आमतौर पर बड़े क्षेत्र में जमीन की खुदाई करनी पड़ती है।
मिश्रित खनन: इसमें एक ही खदान में भूमिगत और ओपनकास्ट दोनों तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है।
सरकार की नई व्यवस्था में विशेष रियायत पाने वाली खदानों के लिए भूमिगत खनन का विकल्प अनिवार्य रहेगा।
नीलामी में रेवेन्यू शेयर की क्या है भूमिका?
कोयला खदानों की व्यावसायिक नीलामी में रेवेन्यू शेयर सबसे महत्वपूर्ण आधारों में से एक है। इसका मतलब है कि खदान से कोयला बेचकर होने वाली निर्धारित आय में से कितने प्रतिशत हिस्से का भुगतान कंपनी सरकार को करेगी।
नीलामी के दौरान कंपनियां इस हिस्सेदारी के आधार पर बोली लगाती हैं। सामान्य व्यवस्था में सबसे अधिक रेवेन्यू शेयर की पेशकश करने वाले बोलीदाता को सफल घोषित किया जाता है।
हालांकि, भूमिगत खनन के लिए विशेष रूप से निर्धारित खदानों में न्यूनतम रेवेन्यू शेयर की दर 2 प्रतिशत होगी। इससे ऐसी परियोजनाओं में निवेश करने वाली कंपनियों को वित्तीय राहत मिल सकती है।
भारत के कोयला उत्पादन पर क्या होगा असर?
भारत में बिजली उत्पादन, उद्योग और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए कोयला एक महत्वपूर्ण ऊर्जा संसाधन है। देश में कोयले की मांग को देखते हुए घरेलू उत्पादन बढ़ाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहा है।
ऐसे में भूमिगत खनन को प्रोत्साहित करने का फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण है। खासकर उन खदानों के लिए जहां भूमिगत तरीके से कोयला निकालने की योजना है।
रेवेन्यू शेयर में कमी और अग्रिम भुगतान से छूट मिलने पर कंपनियों की शुरुआती वित्तीय बाधाएं कम हो सकती हैं। इससे भूमिगत खनन परियोजनाओं में निवेश की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कितनी कंपनियां इन रियायतों के बाद नीलामी में हिस्सा लेती हैं और कितनी परियोजनाएं जमीन पर शुरू हो पाती हैं।
दो कानूनों के तहत लागू होगी नीलामी व्यवस्था
कोयला मंत्रालय की संशोधित कार्यप्रणाली Coal Mines (Special Provisions) Act, 2015 और Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 के तहत होने वाली नीलामी से संबंधित है।
कुल मिलाकर सरकार का यह कदम भूमिगत कोयला खनन को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। हालांकि, कंपनियों को मिलने वाली राहत के साथ खनन पद्धति को लेकर सख्त शर्त भी जोड़ी गई है। अब देखना होगा कि इन बदलावों से देश में भूमिगत कोयला खनन को कितनी गति मिलती है और व्यावसायिक कोयला उत्पादन में इसका कितना योगदान होता है।


