डीएवी आनंद स्वामी पब्लिक स्कूल के विद्यार्थियों ने बुजुर्गों को भेंट किए हाथों से सजाए दीये और शुभकामना कार्ड, कविता, भजन और भाषण से बांटी खुशियां
रांची। दीपावली केवल दीप जलाने और खुशियां मनाने का त्योहार नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में भी रोशनी फैलाने और रिश्तों की अहमियत समझने का अवसर है। इसी संदेश को आत्मसात करते हुए डीएवी आनंद स्वामी पब्लिक स्कूल, हेहल के विद्यार्थियों ने मंगलवार को बरियातू स्थित एक वृद्धाश्रम पहुंचकर वहां रह रहे बुजुर्गों के साथ दीपावली की खुशियां साझा कीं। इस दौरान बच्चों ने बुजुर्गों को अपने हाथों से सजाए गए दीये और दीपावली की शुभकामनाओं से भरे आकर्षक कार्ड भेंट किए। बच्चों के इस स्नेह और अपनापन को देखकर वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्गों के चेहरे खिल उठे।
विद्यालय की ओर से आयोजित इस शैक्षणिक भ्रमण में कक्षा छह डी के विद्यार्थी शामिल हुए। उनके साथ वर्ग शिक्षिका श्रीमती कीर्ति सहगल और शिक्षक पंकज वर्मा भी मौजूद रहे। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को किताबी ज्ञान से आगे बढ़कर सामाजिक जिम्मेदारियों, पारिवारिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं से परिचित कराना था।
कविता और भजनों से बुजुर्गों का जीता दिल
वृद्धाश्रम पहुंचने के बाद विद्यार्थियों ने बुजुर्गों के बीच सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। कक्षा छह डी के बच्चों ने सामूहिक रूप से एक सुंदर कविता प्रस्तुत की। इसके बाद शौर्य, नमन, अनुष्का और अन्य विद्यार्थियों ने अपनी कविताओं, ओजस्वी भाषणों और मधुर भजनों से वहां मौजूद बुजुर्गों का मनोरंजन किया। बच्चों की प्रस्तुतियों ने पूरे माहौल को भावुक और खुशनुमा बना दिया।
इस दौरान विद्यार्थियों ने बुजुर्गों से बातचीत भी की और उनके जीवन के अनुभवों को करीब से जानने का प्रयास किया। बच्चों ने उनसे परिवार, रिश्तों, जीवन के संघर्षों और पारिवारिक परंपराओं से जुड़े कई अनुभव सुने। इस संवाद के दौरान बुजुर्गों ने बच्चों को दादा-दादी और नाना-नानी के महत्व के बारे में भी बताया।
‘दादा-दादी परिवार की ढाल होते हैं’
बुजुर्गों के साथ बातचीत के दौरान एक वरिष्ठ सदस्य की बात ने बच्चों को विशेष रूप से प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि परिवार में दादा-दादी का स्थान बहुत ऊंचा होता है। यदि त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम के पास उनके दादा-दादी होते, तो शायद राजा दशरथ को उन्हें 14 वर्षों के वनवास पर भेजने की नौबत ही नहीं आती। उन्होंने कहा कि दादा-दादी परिवार की ढाल होते हैं, जो बच्चों पर कोई आंच नहीं आने देते।
बुजुर्ग की इस बात ने विद्यार्थियों को परिवार में वरिष्ठ सदस्यों की भूमिका और उनके अनुभवों की अहमियत समझने का अवसर दिया। बच्चों ने महसूस किया कि बुजुर्ग केवल परिवार के सदस्य नहीं, बल्कि संस्कारों, अनुभवों और परंपराओं के वाहक भी होते हैं। उनके सानिध्य में बच्चों को जीवन के ऐसे सबक मिलते हैं, जिन्हें केवल किताबों से सीखना संभव नहीं है।
किताबी ज्ञान के साथ संस्कार देना भी जरूरी : कीर्ति सहगल
इस अवसर पर वर्ग शिक्षिका श्रीमती कीर्ति सहगल ने कहा कि बच्चों को इस तरह के शैक्षणिक भ्रमण पर ले जाने का मुख्य उद्देश्य उन्हें किताबी ज्ञान के साथ जीवन की वास्तविकताओं से परिचित कराना है। उन्होंने कहा कि बच्चे समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों से मिलें, उनकी परिस्थितियों को समझें और मानवीय संवेदनाओं को आत्मसात करें, यह बेहद जरूरी है। उन्होंने बच्चों से हमेशा अपने बड़े-बुजुर्गों का आदर और सम्मान करने की सीख दी।
वहीं, शिक्षक पंकज वर्मा ने भी विद्यार्थियों की इस पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन बच्चों में सेवा, सहयोग और सामाजिक जुड़ाव की भावना विकसित करने में सहायक होते हैं।
नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का विकास विद्यालय का लक्ष्य : डॉ. रेशू चौधरी
विद्यालय की प्रधानाचार्य डॉ. रेशू चौधरी ने इस पहल को बच्चों के सर्वांगीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि विद्यालय का उद्देश्य केवल उत्कृष्ट शिक्षा प्रदान करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में उच्च नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का विकास करना भी है। इस तरह के आयोजनों से बच्चों में समाज के हर वर्ग के प्रति संवेदनशीलता, सहानुभूति और सेवा की भावना जागृत होती है।
उन्होंने कहा कि विद्यालय ऐसे नागरिक तैयार करना चाहता है, जो आधुनिक शिक्षा और ज्ञान के साथ अपनी संस्कृति, परंपराओं और जड़ों से भी जुड़े रहें।
कुल मिलाकर, डीएवी आनंद स्वामी पब्लिक स्कूल की यह पहल विद्यार्थियों के लिए एक यादगार अनुभव बन गई। दीपावली के अवसर पर बच्चों ने जहां बुजुर्गों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरी, वहीं उनके अनुभवों से पारिवारिक रिश्तों, सम्मान और संस्कारों का अनमोल पाठ भी सीखा।
