रांची, 10 अगस्त 2026। जल संकट, भूजल प्रदूषण और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच पानी और प्रकृति को विकास के केंद्र में रखकर समुदाय आधारित समाधान की एक नई पहल आकार ले रही है। WHEELS Global Foundation, WIN Foundation और WaterBANK Foundation की साझेदारी से शुरू की गई ‘बार्टरवाटर’ (BarterWATER) पहल का उद्देश्य स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के साथ जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदाय की भागीदारी को एक ही मॉडल से जोड़ना है।
यह पहल बिहार, झारखंड और असम के विभिन्न क्षेत्रों में टिकाऊ और समुदाय आधारित विकास मॉडल विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।
पानी बचाइए, ‘रेनबो क्रेडिट’ पाइए
बार्टरवाटर मॉडल की खासियत इसका ‘रेनबो क्रेडिट’ सिस्टम है। इसके तहत समुदाय के लोग पानी बचाने, ग्रे-वॉटर के बेहतर प्रबंधन, कचरा पृथक्करण और अन्य पर्यावरण-अनुकूल गतिविधियों में भाग लेकर क्रेडिट अर्जित कर सकते हैं।
इन क्रेडिट का इस्तेमाल स्वच्छ पेयजल के साथ-साथ प्रकृति आधारित उत्पादों और सेवाओं के लिए किया जा सकता है। यानी पर्यावरण संरक्षण को केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समुदाय के लिए प्रत्यक्ष लाभ से जोड़ने की कोशिश की गई है।
आरा के पकड़ी गांव से शुरू हुआ प्रयोग
इस मॉडल का पायलट चरण बिहार के आरा जिले के पकड़ी गांव में 16 फरवरी 2025 को पहले WaterBANK यूनिट की शुरुआत के साथ शुरू हुआ। यहां तकनीक, सामुदायिक भागीदारी और प्रोत्साहन आधारित व्यवस्था को जोड़कर जल सुरक्षा की दिशा में प्रयोग किया जा रहा है।
मॉडल में पानी को सिर्फ प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि समुदाय और प्रकृति के बीच संबंध के केंद्र के रूप में देखा गया है। इसका उद्देश्य लोगों को केवल जल संरक्षण के प्रति जागरूक करना नहीं, बल्कि उनके व्यवहार को स्थानीय प्रोत्साहन व्यवस्था से जोड़ना है।
आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों के लिए IIT खड़गपुर की तकनीक
बार्टरवाटर पहल में आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों के लिए IIT खड़गपुर की विकसित OAS जल शुद्धिकरण तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें लेटराइट खनिज की मदद से पानी में मौजूद आर्सेनिक को बांधने और उसके सुरक्षित निपटान का प्रयास किया जाता है।
भूजल में आर्सेनिक की समस्या वाले क्षेत्रों में कम लागत और स्थानीय स्तर पर लागू किए जा सकने वाले जल शोधन समाधान सुरक्षित पेयजल की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
1,000 रेनबो क्रेडिट से पानी से लेकर बांस के उत्पाद तक
इस मॉडल में पर्यावरण-अनुकूल गतिविधियों को आर्थिक मूल्य देने की कोशिश की गई है। उदाहरण के तौर पर नेट-जीरो ग्रे-वॉटर डिस्चार्ज जैसी व्यवस्था अपनाने वाले परिवारों को 1,000 रेनबो क्रेडिट दिए जा सकते हैं।
इन क्रेडिट का इस्तेमाल स्वच्छ पानी अथवा बांस से बने उत्पादों के लिए किया जा सकता है। कचरा पृथक्करण को प्रोत्साहित करने के लिए बांस के डिब्बे और अन्य प्रकृति आधारित उत्पादों के साथ भी क्रेडिट व्यवस्था को जोड़ा गया है। इस तरह जल संरक्षण, स्वच्छता, कचरा प्रबंधन और स्थानीय उत्पादों को एक सामुदायिक आर्थिक चक्र में जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
अब पानी के प्रबंधन में AI और Digital Twin की दस्तक
बार्टरवाटर मिशन में अब डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को भी जोड़ा जा रहा है। WaterBANK के अनुसार, उसकी AIoT for Water तकनीक को केंद्र में रखकर जल-कुशल कृषि और जल परिसंपत्तियों के बेहतर प्रबंधन के लिए Digital Twin विकसित करने का काम चल रहा है।
Digital Twin वास्तविक जल प्रणालियों का डिजिटल प्रतिरूप होगा। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर इससे जल संसाधनों की स्थिति समझने, संभावित बदलावों का पूर्वानुमान लगाने और पानी के अधिक प्रभावी इस्तेमाल की योजना बनाने में मदद मिल सकती है। इससे WaterBANK का मॉडल केवल स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने तक सीमित न रहकर जल प्रबंधन, पूर्वानुमान और जल-कुशल कृषि तक विस्तार पा रहा है।
सौर ऊर्जा से संचालित होगी व्यवस्था
WaterBANK व्यवस्था को सौर ऊर्जा से संचालित करने के लिए Husk Power Systems जैसी संस्थाओं के सहयोग का उल्लेख किया गया है। वहीं IIT खड़गपुर की तकनीक के व्यावसायीकरण की दिशा में VAS Bros. Enterprises काम कर रहा है।
WHEELS Global Foundation के अनुसार, UNIDO के Global Clean-Tech Innovation Program, UNICEF, भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और National Bamboo Mission सहित विभिन्न संस्थाओं से इस पहल को अलग-अलग स्तर पर समर्थन मिला है। इसके प्रभाव के आकलन के लिए National Institute of Advanced Studies (NIAS), बेंगलुरु से भी जुड़ाव किया गया है।
भारत के गांवों से वैश्विक मंच तक पहुंचाने की तैयारी
WaterBANK के BarterWATER मिशन को अब भारत के ग्रामीण क्षेत्रों से आगे वैश्विक स्तर पर ले जाने की तैयारी भी है। 8 से 10 दिसंबर को अबू धाबी में प्रस्तावित संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलन में BarterWATER मिशन की योजनाओं और अब तक के कार्यों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने की योजना है। इसका उद्देश्य पानी, प्रकृति, तकनीक और सामुदायिक भागीदारी पर आधारित मॉडल को अन्य जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए भी साझा करना है।
विकास की सोच में पानी और प्रकृति को केंद्र में रखने की कोशिश
बार्टरवाटर मॉडल की मूल अवधारणा यह है कि विकास केवल सड़क, बिजली और आर्थिक गतिविधियों तक सीमित न रहे। पानी, प्रकृति, स्थानीय संसाधन और समुदाय भी विकास की योजना के केंद्र में हों।
समुदाय यदि जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण में योगदान देता है तो उसे उसका प्रत्यक्ष लाभ भी मिले-रेनबो क्रेडिट मॉडल इसी सोच को जमीन पर उतारने का प्रयास है। बिहार के आरा से शुरू हुआ यह प्रयोग अब झारखंड और असम तक पहुंच रहा है। अलग-अलग भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में इसके विस्तार के साथ यह पहल समुदाय आधारित जल प्रबंधन के नए रास्ते तलाशने की कोशिश कर रही है।
पानी बचाने वाले व्यवहार को प्रोत्साहन, तकनीक को सामुदायिक जरूरत और प्रकृति को विकास के केंद्र से जोड़ना-बार्टरवाटर मॉडल की यही मूल अवधारणा है।
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