रांची: झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी लगातार राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार और सरकार की उपलब्धियों की गुणगान करते नजर आते है। सोशल मीडिया के जरिए हाल फिलहाल में उन्होंने एक तस्वीर साझा की है जिसमे वो ये बताते नजर आ रहे है कि उनका सपना साकार होते नजर आ रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत तो कुछ और ही बयां करती नजर आ रही है।
सितंबर में सामने आए कई मामले स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी चुनौतियों की ओर इशारा कर रहे हैं। कहीं मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए खटिये का सहारा लेना पड़ रहा है तो कहीं एंबुलेंस सेवा को लेकर कर्मचारियों की समस्याएं सामने आ रही है। कई मामलों में तो गंभीर बीमारी के इलाज के लिए मरीजों को राज्य से बाहर भेजना पड़ रहा है।
पटरी तो दूसरे शहर की ओर जाते नजर आ रही है…
हाल फिलहाल में झारखण्ड से 25 बच्चों को हृदय उपचार के लिए कोच्चि स्थित अमृता अस्पताल भेजा गया। प्रत्येक बच्चे के इलाज पर करीब 10 लाख रुपये तक खर्च होने की जानकारी सामने आई है। बेशक यह एक उप्लब्धिब है, झारखण्ड स्वास्थय विभाग इतना सक्षम हो गया है कि बच्चों को इलाज के लिए बहार भेजा जा रहा वो भी सरकारी खर्च पर।
सरकार की यह पहल उन परिवारों के लिए राहत जरूर है, जो अपने दम पर महंगा इलाज नहीं करा सकते। लेकिन जरा सोचिए, यदि झारखण्ड की स्वास्थ्य व्यवस्था पटरी पर आ चुकी है तो हृदय रोग पीड़ित बच्चों को बहार क्यों भेजा जा रहा है?
सवाल सिर्फ कोच्चि भेजने का नहीं
कोच्चि भेजे जा रहे बच्चों का इलाज मुफ्त होना निश्चित रूप से उन परिवारों के लिए राहत है। लेकिन इसे झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की अंतिम मंजिल नहीं माना जा सकता।
अगर सरकार गंभीर बीमारी के इलाज के लिए बच्चों को दूसरे राज्य भेजने का खर्च उठा सकती है, तो झारखंड में ऐसी विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाओं को स्थायी रूप से मजबूत क्यों नहीं कर सकती ?
क्योंकि गरीब परिवार के लिए दूसरे राज्य में इलाज सिर्फ ऑपरेशन का खर्च नहीं होता। उसके साथ सफर, परिजनों के रहने, देखभाल और लंबे इलाज की दूसरी चुनौतियां भी जुड़ती हैं।
गांव में मरीज, सड़क पर डोली-खटोली…
गढ़वा के भवनाथपुर प्रखंड के मकरी पंचायत स्थित ढेकुलिया टोला का मामला इस तस्वीर को और गंभीर बनाता है। यहां 64 वर्षीय बीमार वृद्धा धनपतिया को इलाज के लिए करीब एक किलोमीटर तक डोली-खटोली पर टांगकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ा।
एक तरफ स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर होने का दावा किया जा रहा है, दूसरी तरफ किसी बीमार बुजुर्ग को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए आज भी ग्रामीणों को डोली का सहारा लेना पड़ रहा है। इन सभी पहलुओं पर मंत्री जी की नजर क्यों नहीं जा रही है? नजर घुमाइए आलम साहब। स्थिति अभी भी दैन्य ही है।
108 एंबुलेंस सेवा भी ठप
अस्पताल तो अस्पताल, 108 एंबुलेंस सेवा के कर्मचारियों की समस्याएं भी सामने आई। कर्मचारियों ने संचालन एजेंसी की ओर से किए गए वादे पूरे नहीं होने, वेतन में देरी और दूसरी सुविधाओं से जुड़ी शिकायतें उठाईं। स्वास्थ्य मंत्री के साथ बैठक के बाद प्रस्तावित आंदोलन स्थगित किया गया। इसके बाद भी माननीय स्वास्थ्य मंत्री जी कह रहे है कि झारखण्ड कि स्वास्थ्य व्यवस्था पटरी पर आ गई है।
स्वास्थ्य व्यवस्था केवल अस्पताल की बिल्डिंग, मशीन या योजना का नाम नहीं है जनाब। मरीज के घर से अस्पताल तक पहुंचाने वाली एंबुलेंस भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है।
RIMS में संसाधनों और सप्लाई को लेकर भी सवाल
सितंबर में RIMS में एजेंसियों के करीब 44 करोड़ रुपये के बिल लंबित होने और भुगतान में देरी के कारण दवाओं, मेडिकल उपकरणों, इम्प्लांट और दूसरी जरूरी सामग्री की सप्लाई प्रभावित होने की रिपोर्ट सामने आई। यह रिपोर्ट काफी है बताने के लिए कि अस्पताल की रोजमर्रा की व्यवस्था कितनी पटरी पर है।
दूसरी ओर, विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी को लेकर भी सितंबर में रिपोर्ट सामने आई। स्वास्थ्य मंत्री ने विशेषज्ञों की कमी दूर करने की दिशा में काम करने की बात कही थी। लेकिन ये कब तक पूरी होगी इसका कोई भरोसा नहीं है।
ना तो पर्याप्त विशेषज्ञ डॉक्टर हैं, नहीं जरूरी उपकरण काम कर रहे हैं, नहीं दवाएं और मेडिकल सामग्री समय पर मिल रही हैं और नहीं मरीज वहां तक समय पर पहुंच पा रहे है।
आज कि ताजा खबर गलत इंजेक्शन से गई महिला की जान
अभी अभी एक खबर आई है जिसमे ये बताया गया है कि हजारीबाग की रहने वाली 31 वर्ष मालती देवी को गलत इंजेक्शन दिया गया जिससे उनकी मौत हो गई। सवाल पूछने पर अधिकारी पर्ची छिपाकर भाग गए। ना जाने कई ऐसे मामलें होंगे जिनमे गलत पैर का ऑपरेशन, तो कही संक्रमित खून चढाने का मामला तो कही खून की उपलब्धता की कमी रही है।
स्वास्थ्य मंत्री अगर व्यवस्था के पटरी पर आने की बात कर रहे हैं, तो अब जनता भी यही देखना चाहती है कि उस पटरी का असर अस्पताल की बिल्डिंग और सरकारी बयानों से निकलकर गांव के मरीज, एंबुलेंस और सरकारी अस्पताल के बेड तक कब पहुंचेगा।
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