ट्रांसपोर्ट नगर के लिए जमीन अधिग्रहण के मुआवजे में बड़ा घोटाला! 4.50 करोड़ रुपये के भुगतान में आधी रकम दलाल के खाते में भेजने का आरोप, आदिवासी छात्र संघ के अध्यक्ष ने डीसी से की शिकायत; रांची पुलिस को FIR दर्ज करने का निर्देश
रांची। राजधानी रांची में सरकारी जमीन अधिग्रहण और मुआवजे के भुगतान के नाम पर करोड़ों रुपये के कथित खेल का सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोप है कि ट्रांसपोर्ट नगर निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण के दौरान भू-स्वामियों को मिलने वाली मुआवजे की राशि में जिला भू-अर्जन कार्यालय के कुछ कर्मियों और दलालों ने मिलकर बड़ी रकम की वसूली की। मामला कांके प्रखंड के सुकुरहुटू में ट्रांसपोर्ट नगर के लिए अधिग्रहित जमीन से जुड़ा है। आरोप है कि करीब 4 करोड़ 50 लाख रुपये के मुआवजे में से आधी रकम यानी 2 करोड़ 25 लाख रुपये दलाल के माध्यम से वसूल कर ली गई। इस पूरे मामले में सरकारी कार्यालय के कर्मियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
मामले की शिकायत रांची के उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री से की गई है। शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि जमीन के मुआवजे की राशि जारी कराने के नाम पर लाभुकों से बड़ी रकम ली गई। शिकायत के बाद डीसी ने मामले में रांची पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया है। वहीं, शिकायत में नाम आने वाले लोगों के बैंक खातों को फ्रीज किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी मुआवजे की रकम में कथित बंदरबांट का यह खेल किसके इशारे पर चल रहा था और इसमें कितने लोग शामिल हैं?
73 डिसमिल जमीन, 4.50 करोड़ का मुआवजा और आधी रकम पर कथित डाका
पूरा मामला सुकुरहुटू में प्रस्तावित ट्रांसपोर्ट नगर के लिए जमीन अधिग्रहण से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, यहां दो अलग-अलग खातों से कुल 73 डिसमिल जमीन का अधिग्रहण किया गया था। इसके बदले जमीन के मालिकों को करीब 4 करोड़ 50 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया गया।
लेकिन आरोप है कि मुआवजे की पूरी रकम लाभुकों तक पहुंचने के बजाय उसके एक बड़े हिस्से पर दलालों और कथित तौर पर सरकारी कर्मियों की नजर थी। आरोप है कि भुगतान की प्रक्रिया में मदद करने और मुआवजे की रकम दिलाने के नाम पर 2 करोड़ 25 लाख रुपये वसूल लिए गए।
यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल रिश्वतखोरी का मामला नहीं होगा, बल्कि जमीन अधिग्रहण के नाम पर गरीब और आदिवासी जमीन मालिकों के अधिकारों के साथ गंभीर खिलवाड़ का मामला भी होगा।
नुरूल होदा के बैंक खाते में भेजे गए 2.25 करोड़ रुपये!
शिकायत में कांके के सुकुरहुटू निवासी जमीन कारोबारी और कथित दलाल नुरूल होदा का नाम प्रमुखता से सामने आया है। आरोप है कि मुआवजे की राशि में से 2 करोड़ 25 लाख रुपये नुरूल होदा के माध्यम से वसूले गए।
शिकायत में भारतीय स्टेट बैंक की कांके ब्लॉक शाखा में संचालित नुरूल होदा के खाता संख्या 45026420579 का भी उल्लेख किया गया है। आरोप है कि इसी खाते में कथित तौर पर करोड़ों रुपये की रकम भेजी गई।
अब जांच का अहम बिंदु यह होगा कि खाते में कितनी रकम आई, किसने भेजी, किस तारीख को भेजी गई और उसके बाद यह पैसा किन-किन खातों में ट्रांसफर हुआ। बैंक लेनदेन की जांच से कथित वसूली के पूरे नेटवर्क का खुलासा हो सकता है।
भू-अर्जन कार्यालय के कर्मियों पर भी गंभीर आरोप
इस मामले में सिर्फ दलाल की भूमिका पर सवाल नहीं उठाए गए हैं, बल्कि रांची जिला भू-अर्जन कार्यालय के कुछ कर्मियों के नाम भी शिकायत में शामिल किए गए हैं।
शिकायत में नजीर, अमीन राज कुमार महतो और लाल साहब को कथित तौर पर रुपये दिए जाने का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि मुआवजे की राशि दिलाने के नाम पर सरकारी कार्यालय के कर्मियों और बिचौलियों के बीच मिलीभगत थी।
हालांकि, इन सभी आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच जरूरी है। जिन सरकारी कर्मियों के नाम सामने आए हैं, उनकी भूमिका, बैंक लेनदेन, फोन संपर्क और मुआवजा भुगतान की पूरी प्रक्रिया की जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
आदिवासी जमीन मालिकों की शिकायत, अंधे चंदुर पाहन भी पहुंचे डीसी के दरबार
इस मामले को आदिवासी जमीन मालिकों के शोषण से जोड़कर भी देखा जा रहा है। आदिवासी छात्र संघ के अध्यक्ष संजय महली ने इस पूरे मामले को लेकर रांची के उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री से शिकायत की है।
शिकायत में मोतिलाल पाहन, तेतरी देवी, झनकु पाहन और चंदुर पाहन के नाम सामने आए हैं। बताया गया है कि इन जमीन मालिकों ने भी मुआवजे के भुगतान में कथित गड़बड़ी और रकम वसूली को लेकर अपनी शिकायत दर्ज कराई है।
इस पूरे मामले में चंदुर पाहन का नाम विशेष रूप से चर्चा में है। बताया गया है कि चंदुर पाहन दृष्टिबाधित हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जमीन अधिग्रहण और मुआवजे की जटिल प्रक्रिया का फायदा उठाकर कमजोर और असहाय जमीन मालिकों को निशाना बनाया गया? क्या उन्हें उनकी जमीन के बदले मिलने वाली पूरी रकम मिली? या फिर मुआवजे की राशि का बड़ा हिस्सा बिचौलियों के जरिए निकाल लिया गया?
यह मामला सिर्फ आर्थिक अनियमितता तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि जमीन मालिकों के अधिकार और सरकारी व्यवस्था में उनकी सुरक्षा से भी जुड़ जाता है।
डीसी का हस्तक्षेप, पुलिस को FIR दर्ज करने का निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए रांची के उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री ने रांची पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया है। शिकायत के बाद आरोपियों से जुड़े बैंक खातों को फ्रीज किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
अब पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती कथित वसूली की रकम का पूरा हिसाब निकालने की होगी। बैंक खातों की जांच, मुआवजे के भुगतान से जुड़े दस्तावेज, जमीन अधिग्रहण की फाइलें और संबंधित लोगों के बीच हुए लेनदेन की पड़ताल इस जांच के महत्वपूर्ण हिस्से होंगे।
जांच में यह भी स्पष्ट करना होगा कि मुआवजे की रकम किस आधार पर निर्धारित की गई, वास्तविक लाभुकों को कितनी राशि मिली और कथित तौर पर 2.25 करोड़ रुपये किस परिस्थिति में दलाल के खाते तक पहुंचे।
अब सवालों के घेरे में जिला भू-अर्जन कार्यालय
ट्रांसपोर्ट नगर जैसी महत्वपूर्ण सरकारी परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण के दौरान यदि मुआवजे की रकम में इस तरह की कथित वसूली हुई है, तो यह जिला भू-अर्जन कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
क्या सरकारी कार्यालय में बिचौलियों का नेटवर्क सक्रिय था? क्या जमीन मालिकों को मुआवजे की राशि दिलाने के नाम पर दबाव बनाया गया? क्या दलालों के जरिए सरकारी कर्मियों तक पैसे पहुंचाए गए? और क्या इस कथित खेल में कुछ अन्य लोग भी शामिल हैं?
इन सवालों के जवाब अब पुलिस जांच से मिलने की उम्मीद है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस सरकारी व्यवस्था का काम जमीन मालिकों को उनकी जमीन का उचित मुआवजा दिलाना है, उसी व्यवस्था के भीतर यदि करोड़ों की कथित वसूली का खेल चल रहा था, तो इसकी भनक जिम्मेदार अधिकारियों को क्यों नहीं लगी? सुकुरहुटू की 73 डिसमिल जमीन से शुरू हुआ यह मामला अब रांची के जिला भू-अर्जन कार्यालय की कार्यप्रणाली और जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन गया है।
अब देखना होगा कि पुलिस की FIR और जांच सिर्फ दलाल तक सीमित रहती है या फिर कथित वसूली के पूरे नेटवर्क और उसमें शामिल हर व्यक्ति की भूमिका सामने आती है।
