Wednesday, November 4

संस्कृत विभाग की ओर से आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने बताया प्रकृति और मानव जीवन का गहरा संबंध, छात्राओं ने विचारों के साथ प्रस्तुत की रचनात्मक प्रतिभा

ओरमांझी: राम टहल चौधरी महाविद्यालय, ओरमांझी के संस्कृत विभाग के तत्वावधान में मंगलवार को ‘वैदिक साहित्य में पर्यावरण’ विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। महाविद्यालय के स्मार्ट हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में शिक्षकों और छात्राओं ने वैदिक साहित्य में प्रकृति, पर्यावरण संरक्षण और भारतीय जीवनशैली के बीच संबंधों पर अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने कहा कि वैदिक संस्कृत साहित्य और पर्यावरण के बीच अन्योन्याश्रय संबंध रहा है। वैदिक परंपरा में प्रकृति के संवर्धन और संरक्षण को जीवन का आधार माना गया है।

कार्यशाला में वक्ताओं ने कहा कि पर्यावरण केवल मानव जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने वाला माध्यम नहीं है, बल्कि समूची सृष्टि के अस्तित्व का आधार है। भारतीय संस्कृति और वैदिक साहित्य में प्रकृति के विभिन्न तत्वों को विशेष महत्व दिया गया है। जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का संदेश प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में मिलता है। ऐसे में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और उसके संरक्षण की भावना भारतीय जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रही है।

प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने का संदेश

कार्यशाला में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय जीवनशैली प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीने की प्रेरणा देती है। वैदिक साहित्य में पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन को केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जीवन के लिए आवश्यक आधार के रूप में रेखांकित किया गया है। प्रकृति के संसाधनों का संतुलित उपयोग और उनका संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण है।

वक्ताओं के अनुसार, वर्तमान समय में पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों के बीच वैदिक साहित्य की शिक्षाओं को समझना और उन्हें व्यवहार में अपनाना जरूरी है। प्राचीन ज्ञान परंपरा में प्रकृति के प्रति सम्मान और उसके साथ संतुलित व्यवहार की जो भावना दिखाई देती है, वह आज भी प्रासंगिक है।

शिक्षकों ने रखे अपने विचार

कार्यशाला में महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. भीम महतो ने विषय की महत्ता पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और वैदिक साहित्य के संबंध को समझने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके अलावा प्रो. शैलेन्द्र मिश्र, प्रो. रीता कुमारी, प्रो. रेणु चौधरी, प्रो. मीनू कुमारी और डॉ. अनुराधा ने भी अपने-अपने विचार साझा किए।

शिक्षकों ने कहा कि विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत से जोड़ने के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बनाना भी शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। इस तरह की कार्यशालाएं विद्यार्थियों को किसी विषय को केवल किताबी ज्ञान के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक और व्यावहारिक संदर्भों में समझने का अवसर देती हैं।

छात्राओं ने भी साझा किए विचार, पेंटिंग बनी आकर्षण

कार्यशाला में विभाग की छात्राओं लक्ष्मी छाया, सीमा वेदिया, प्रीति कुमारी और प्रिया कुमारी सहित अन्य छात्राओं ने भी विषय पर अपने विचार रखे। छात्राओं ने पर्यावरण संरक्षण के महत्व और प्रकृति के साथ मानव जीवन के संबंध को लेकर अपनी समझ प्रस्तुत की। उनकी सहभागिता से कार्यक्रम में शैक्षणिक चर्चा के साथ विद्यार्थियों की रचनात्मक भागीदारी भी देखने को मिली।

इस अवसर पर छात्रा सीमा वेदिया द्वारा पर्यावरण विषय पर बनाई गई पेंटिंग विशेष आकर्षण का केंद्र रही। उपस्थित लोगों ने पेंटिंग की सराहना की। इसके माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के संदेश को रचनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गया।

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