Monday, November 2

रांची: दीपावली पर घरों को रोशन करने के लिए बाजार में कई तरह के दीये मिलते हैं, लेकिन रांची में इस बार कुछ दीये अपनी रोशनी के साथ आत्मनिर्भरता की एक कहानी भी लेकर आ रहे हैं। ये दीये गाय के गोबर से तैयार किए जा रहे हैं और इन्हें बनाने में जुटी हैं ग्रामीण इलाकों की 500 से अधिक महिलाएं। खास बात यह है कि इस काम से विधवा महिलाओं, बुजुर्गों और कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियों को भी रोजगार का अवसर मिल रहा है। घर की जिम्मेदारियों के बीच महिलाएं अपनी सुविधा और क्षमता के अनुसार काम कर रही हैं और अपनी आमदनी का रास्ता बना रही हैं।

इस पहल की शुरुआत कोरोना काल में सोनाली और रोशन ने की थी। गोबर को उपयोगी उत्पादों में बदलने का विचार धीरे-धीरे एक ऐसे काम में बदल गया, जिससे आज सैकड़ों महिलाएं जुड़ी हैं। ‘गोवर क्राफ्ट’ के नाम से शुरू हुई इस पहल के तहत अब 41 तरह के सजावटी और उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इनमें डिजाइनर दीये, लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां, झालर और घर की सजावट के सामान शामिल हैं। यह काम पिछले तीन वर्षों से लगातार चल रहा है और यहां पूरे साल उत्पादन होता है।

गोबर से रोजगार तक का सफर

इस पहल के पीछे सोच सिर्फ गोबर से सजावटी सामान तैयार करने की नहीं थी, बल्कि स्थानीय संसाधनों के इस्तेमाल से ग्रामीण परिवारों के लिए आय का नया साधन तैयार करना भी था। सोनाली और रोशन ने देखा कि गोबर का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पाता। इसी से उन्होंने ऐसे उत्पाद बनाने की शुरुआत की, जिनका इस्तेमाल त्योहारों और घर की सजावट में किया जा सके।

शुरुआत में कुछ उत्पाद तैयार किए गए। धीरे-धीरे नए डिजाइन जुड़े और उत्पादों की संख्या बढ़ती गई। आज गोबर और हल्की मिट्टी के मिश्रण से अलग-अलग आकार के दीये, देवी-देवताओं की मूर्तियां और सजावटी सामान बनाए जा रहे हैं। उत्पादों को सांचों में आकार देने के बाद सुखाया जाता है, उनकी फिनिशिंग की जाती है और फिर रंगों से सजाया जाता है।

प्रशिक्षण के बाद महिलाओं को मिलता है काम

झारखंड डिजिटल से बातचीत में गोवर क्राफ्ट की संचालक सोनाली ने बताया कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का अवसर देना है। इसके लिए पहले महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जाता है और काम सीखने के बाद उन्हें उत्पाद तैयार करने का काम सौंपा जाता है।

इससे जुड़ी महिलाओं में बड़ी संख्या विधवाओं, बुजुर्गों और कॉलेज की छात्राओं की है। खास बात यह है कि काम करने के लिए महिलाओं पर किसी तरह का दबाव नहीं रहता। वे अपनी सुविधा के अनुसार आती हैं और अपनी क्षमता के मुताबिक काम करती हैं। घरेलू जिम्मेदारियों, पढ़ाई और दूसरी जरूरतों के बीच भी उन्हें काम करने का अवसर मिलता है।

इस व्यवस्था से महिलाओं को रोजगार के लिए घर से दूर जाने या तय समय में काम पूरा करने की बाध्यता नहीं रहती। वे अपनी उपलब्धता के हिसाब से काम कर सकती हैं। तैयार उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी स्टार्टअप की ओर से संभाली जाती है।

पूरे साल चलता है काम, सप्ताह के दिनों के हिसाब से बनते हैं दीये…

गोवर क्राफ्ट में काम केवल दीपावली तक सीमित नहीं है। यहां पूरे 12 महीने उत्पादन चलता है। दीयों की एक खास श्रृंखला भी तैयार की जाती है, जिसमें सप्ताह के सातों दिनों और हिंदू पंचांग के अनुसार अलग-अलग तरह के दीये बनाए जाते हैं।

सोनाली के मुताबिक, शनिवार के लिए सरसों के तेल और काले तिल वाला दीया उपलब्ध कराया जाता है, जबकि मंगलवार के लिए चमेली के तेल वाला दीया तैयार किया जाता है। इसी तरह सप्ताह के अन्य दिनों के लिए भी अलग-अलग प्रकार के दीये बनाए जाते हैं। इससे उत्पादों की विविधता बनी रहती है और त्योहारों के अलावा भी इनकी मांग के लिए विकल्प तैयार होते हैं।

गोबर की खरीद से पशुपालकों को भी अतिरिक्त आमदनी

इस पहल से सिर्फ उत्पाद बनाने वाली महिलाएं ही नहीं, बल्कि पशुपालक भी जुड़ रहे हैं। स्टार्टअप की ओर से करीब 10 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से गोबर खरीदा जाता है। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाले देसी गाय के गोबर को प्राथमिकता दी जाती है। इससे पशुपालकों को भी गोबर से अतिरिक्त आमदनी का अवसर मिल रहा है।

इस तरह एक ओर पशुपालकों के लिए गोबर उपयोगी संसाधन बन रहा है, तो दूसरी ओर उसी से तैयार उत्पाद महिलाओं की आजीविका का आधार बन रहे हैं।

झारखंड से बाहर भी पहुंच रहे उत्पाद

गोबर से बने दीये और दूसरे उत्पादों की बिक्री केवल रांची या झारखंड तक सीमित नहीं है। इनकी आपूर्ति राज्य के बाहर भी की जा रही है और थोक में भी ऑर्डर मिलते हैं। ऑनलाइन माध्यमों के अलावा अलग-अलग मेलों और प्रदर्शनियों में स्टॉल लगाकर भी उत्पादों को ग्राहकों तक पहुंचाया जाता है।

अब इस कारोबार को और बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी है। सोनाली ने बताया कि आगे कई छोटी-छोटी इकाइयां बनाकर काम का विस्तार करने की योजना है। इससे अलग-अलग क्षेत्रों की अधिक महिलाओं को जोड़ा जा सकेगा। धीरे-धीरे इस व्यवसाय को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का लक्ष्य है।

रांची गौशाला न्यास में भी तैयार किये जाते है गोबर के दिये…

रांची में गोबर से दीये तैयार करने की पहल केवल गोवर क्राफ्ट तक सीमित नहीं है। रांची गौशाला न्यास में भी इसी तरह गोबर के दीये बनाए जाते है। यहां भी महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने के उद्देश्य से अलग-अलग पहल की जा रही हैं। ऐसे प्रयास स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के इस्तेमाल के साथ महिलाओं को काम और हुनर दिखाने का अवसर दे रहे हैं।

कमाई के साथ अपनी पहचान बना रहीं महिलाएं

इस काम से जुड़ी महिलाओं के लिए रोजगार का मतलब सिर्फ कुछ पैसे कमाना नहीं है। अपनी मेहनत से आमदनी होने पर वे बच्चों की पढ़ाई, घर की जरूरतों और छोटे-बड़े खर्चों में योगदान दे पा रही हैं। परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों में उनकी भागीदारी बढ़ रही है और उन्हें अपनी अलग पहचान बनाने का अवसर मिल रहा है।

कोरोना काल में शुरू हुआ एक छोटा-सा विचार आज 500 से अधिक महिलाओं के लिए काम का जरिया बन चुका है। गोबर से तैयार दीये और सजावटी सामान बाजार तक पहुंच रहे हैं, पशुपालकों को अतिरिक्त आय का अवसर मिल रहा है और महिलाएं अपनी सुविधा के अनुसार रोजगार से जुड़ रही हैं। इस दीपावली इन दीयों की रोशनी केवल घरों और आंगनों तक नहीं पहुंचेगी, बल्कि उन महिलाओं की मेहनत और आत्मनिर्भर बनने की कोशिश को भी सामने लाएगी, जिनके हाथों से ये दीये तैयार हो रहे हैं।

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