Thursday, November 5

रांची। झारखंड में JPSC-JSSC की गड़बड़ियों को लेकर सियासत एक बार फिर तेज है। आजसू सुप्रीमो और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो ने दैनिक भास्कर में छपे एक खबर का हवाला देते हुए बोकारो के परीक्षा केंद्र संख्या 102 को लेकर सवाल खड़े किए। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया कि इसी एक केंद्र से 147 अभ्यर्थी सफल हुए और नियुक्ति घोटालों के आरोपी बताए जा रहे अभय तिवारी ने भी इसी केंद्र से परीक्षा दी थी। सुदेश महतो ने परीक्षा संचालन की जिम्मेदारी जिला प्रशासन पर डालते हुए बोकारो डीसी अजय नाथ झा को भी सवालों के घेरे में खड़ा किया।

लेकिन सुदेश महतो के इस पोस्ट के कुछ ही देर बाद उनके पूर्व करीबी रहे हिमांशु कुमार ने ऐसा जवाब दिया कि पूरा मामला अब सिर्फ बोकारो परीक्षा केंद्र तक सीमित नहीं रह गया।

हिमांशु कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में सुदेश महतो के दावे पर ही सवाल खड़े करते हुए कहा कि JPSC PGT-2023 की परीक्षा 18 अगस्त से 10 सितंबर 2023 के बीच हुई थी, जबकि JSSC CGL-2023 की मुख्य परीक्षा सितंबर 2024 में हुई। ज्ञांत हो कि अजय नाथ झा 27 मई 2025 को बोकारो के उपायुक्त बने। यानी जिस समय ये परीक्षाएं हुईं, उस समय अजय नाथ झा बोकारो के डीसी थे ही नहीं।

जरा सोचिए जिस अधिकारी के कार्यकाल में परीक्षा हुई ही नहीं, उसके सिर पर परीक्षा केंद्र की गड़बड़ी की जिम्मेदारी कैसे डाली जा रही है?

सुदेश जी पहले तारीख तो देख लेते: हिमांशु

हिमांशु कुमार ने सिर्फ परीक्षा की तारीखों का जिक्र नहीं किया, बल्कि सुदेश महतो को दूसरे मुद्दों पर भी घेरा।

उन्होंने रांची के रविंद्र भवन और पथ निर्माण विभाग में गड़बड़ियों का जिक्र करते हुए सवाल किया कि अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई इतनी ही जरूरी है, तो इन मामलों पर सुदेश महतो खुलकर क्यों नहीं बोलते?

यही सवाल अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।

क्या भ्रष्टाचार का मुद्दा भी सुविधा के हिसाब से चुना जाएगा?

जहां राजनीतिक फायदा दिखे, वहां सवाल और जहां अपने राजनीतिक दायरे से जुड़े सवाल खड़े हों, वहां चुप्पी – क्या झारखंड की राजनीति अब इसी तरीके से चलेगी?

JPSC की लड़ाई में जयपाल सिंह स्टेडियम पहुंचा लगभग पूरा सियासी विपक्ष

इस पूरे विवाद को समझने के लिए जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम के आंदोलन को भी याद करना जरूरी है।

JPSC-JSSC के अभ्यर्थी कई दिनों तक स्टेडियम में डटे रहे। बारिश, भूख हड़ताल और पुलिस कार्रवाई के बीच युवाओं ने अपनी मांगों को लेकर आंदोलन जारी रखा। इस दौरान विपक्ष के कई बड़े नेता छात्रों के बीच पहुंचे।

नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने स्टेडियम पहुंचकर अभ्यर्थियों से मुलाकात की। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू ने भी छात्रों के मुद्दे पर सरकार को घेरा। JLKM नेता देवेंद्र नाथ महतो आंदोलन के प्रमुख चेहरों में रहे। जयराम महतो ने भी आंदोलन को समर्थन दिया। इस बीच सुदेश महतो का नाम लुप्त हो गया। आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो का दूर दूर तक आंदोलन में नाम नहीं आया। यानी अभ्यर्थियों की लड़ाई जब सड़क पर थी, तब अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता उनके बीच पहुंच रहे थे।

सुदेश जी, जब अभ्यर्थी दिन-रात स्टेडियम में बैठे थे, तब आपकी आवाज इतनी मुखर क्यों नहीं थी?
नेता जी पहुंचे भी कब थे, जब आंदोलन अपनी अंतिम साँसे ले रहा था। केवल हाजरी मात्र उनकी एक झलक देखने को मिली थी।

जब आपको पता है कि JPSC-JSSC की गड़बड़ियां इतनी गंभीर हैं कि आप गृह मंत्री अमित शाह तक मामला ले जा रहे हैं, तो फिर उन दिनों अभ्यर्थियों के साथ आपका राजनीतिक और व्यक्तिगत जुड़ाव क्यों देखने को नहीं मिला ?

आजसू के युवा कार्यकर्ता अगर अभ्यर्थियों के समर्थन में आवाज उठा रहे थे, तो फिर पार्टी के सर्वोच्च नेता को खुद मैदान में उतरने में इतना समय क्यों लगा?

JPSC विवाद और मुकेश कुमार महतो

JPSC विवाद पर सुदेश महतो से सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि पुराने द्वितीय JPSC मामले की रिपोर्टिंग और जांच से जुड़ी जानकारी में उनके भाई मुकेश कुमार महतो का नाम सामने आया था।

हाल में छपे एक रिपोर्ट के मुताबिक CBI की रिपोर्ट में मुकेश कुमार महतो को सुदेश महतो का भाई बताया गया था और उनके अंकों में पुनर्मूल्यांकन के दौरान बड़े बदलाव का उल्लेख किया गया है।

जब JPSC में धांधली का मुद्दा सामने आया और आपके अपने परिवार से जुड़े व्यक्ति का नाम भी जांच के संदर्भ में आया, तब आपने इस मामले को उसी ताकत से क्यों नहीं उठाया, जिस ताकत से आज उठा रहे हैं? क्या यही वजह थी कि सुदेश महतो लंबे समय तक JPSC अभ्यर्थियों के मुद्दे पर खुलकर सामने आने से बचते रहे?

सुदेश महतो झारखंड के गृह मंत्री रहे हैं, तो सवाल और भी बड़ा है

सुदेश महतो झारखंड के गृह मंत्री रहे हैं। ऐसे में पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर उनकी राजनीतिक जिम्मेदारी का सवाल भी स्वाभाविक है। अगर आज वे प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं, तो अपने पुराने कार्यकाल की पुलिस व्यवस्था और उस दौरान सामने आए विवादों पर भी क्या वे उतनी ही खुली बहस के लिए तैयार हैं?

सवाल सिर्फ बोकारो डीसी से क्यों?

हिमांशु कुमार ने सुदेश महतो को जिस बात पर सबसे ज्यादा घेरा, वह यही है कि किसी अधिकारी पर आरोप लगाने से पहले यह देखना जरूरी है कि घटना के समय वह अधिकारी उस पद पर था भी या नहीं।

अगर अजय नाथ झा मई 2025 में बोकारो डीसी बने और जिस परीक्षा को लेकर सवाल उठाया जा रहा है वह उससे पहले हुई, तो फिर सुदेश महतो के आरोप का आधार क्या है? क्या सिर्फ इसलिए कि अधिकारी आज बोकारो के डीसी हैं, और वह जमीन से जुड़े मुद्दों को उठा रहे है, लोगों कि सस्याओं का समाधान कर रहे है, इसीलिए उन्हें पुराने मामलों में घसीटा जा रहे है?

सवाल यह है कि जब हजारों युवा अपने भविष्य के लिए सड़क पर लड़ रहे थे, तब आपकी आवाज कहां थी?

आज अगर आप उन युवाओं के सवाल को दिल्ली तक ले जा रहे हैं, तो यह स्वागत योग्य है। लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछने वाले से भी सवाल पूछे जाते हैं। बोकारो डीसी से जवाब मांगने से पहले सुदेश महतो को भी झारखंड के युवाओं के इन सवालों का जवाब देना चाहिए।

क्योंकि JPSC का मामला सिर्फ एक परीक्षा का मामला नहीं है। यह उन लाखों युवाओं के भविष्य का सवाल है, जिन्होंने वर्षों तक मेहनत की है।

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