Tuesday, September 22

 

6 अगस्त से आगामी मानसून सत्र आहूत है और इस बार सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव की भारी आशंका है. समय रहते अगर इस मुद्दे को नहीं संभाला गया तब विधानसभा का यह सत्र भी हंगामे की भेंट चढ़ जाएगा. JPSC परीक्षा में विवाद को लेकर विपक्ष पहले से ही हमलावर है और NDA के घटक दल छात्रों के समर्थन में खुलकर सामने आ रहे हैं. इस बार के सत्र में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है. एक तरफ उसे प्रशासनिक विश्वसनीयता बनाए रखनी है तो दूसरी तरफ राजनीतिक संतुलन भी साधना है. यदि इस मुद्दे पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह केवल एक परीक्षा विवाद नहीं रहेगा, बल्कि शासन की साख का संकट बन सकता है.

 

29 परीक्षाएँ, 16 विवाद—सवालों के घेरे में व्यवस्था

यह तथ्य अपने आप में गंभीर है कि JPSC और JSSC द्वारा आयोजित 29 परीक्षाओं में से 16 पर गड़बड़ी के आरोप लगे हैं. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इतने बड़े पैमाने पर विवाद किसी भी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा कर देता है. हालांकि यह भी सच है कि सभी नियुक्तियाँ संदिग्ध नहीं कही जा सकतीं, लेकिन जिन मामलों में जांच चल रही है या न्यायालय में मामला लंबित है, वे पूरे सिस्टम पर प्रश्नचिन्ह जरूर खड़े करते हैं. यहाँ एक जटिल स्थिति पैदा होती है—जो अधिकारी इन विवादित प्रक्रियाओं के तहत नियुक्त हुए, वे वर्षों से प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा हैं. वे नीतियाँ बना रहे हैं, योजनाएँ लागू कर रहे हैं और शासन के पहिये को चला रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है—यदि नियुक्ति प्रक्रिया पर ही संदेह हो, तो शासन की निष्पक्षता और दक्षता पर क्या असर पड़ता होगा?

 

संविधान की मंशा बनाम जमीनी हकीकत

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 316 के तहत लोक सेवा आयोगों की स्थापना का उद्देश्य स्पष्ट था—ऐसे योग्य, ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तियों का चयन, जो दशकों तक जनता की सेवा करें. परंतु झारखंड में आयोग के शुरुआती गठन से ही जिस तरह की प्रक्रियात्मक लापरवाहियाँ सामने आईं, उसने इस मूल भावना को कमजोर कर दिया. यदि उस समय अध्यक्ष और सदस्यों के चयन में व्यापक विमर्श, पारदर्शिता और सख्त मानदंड अपनाए जाते, तो शायद आज की स्थिति कुछ और होती. कार्मिक विभाग के स्तर पर पैनल बनाने, निगरानी जांच और विश्वविद्यालयों से स्वच्छता प्रमाण-पत्र लेने जैसे सुझाव कागजों तक सीमित रह गए—या फिर उनका प्रभावी अनुपालन नहीं हुआ.

राजनैतिक दलों के हर पल बदलते चेहरे

आज जब JPSC और JSSC में अनियमितताओं को लेकर छात्र सड़कों पर हैं, तो राजनीतिक दलों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है.

राज्य की राजनीति में यह एक विचित्र स्थिति है—

जहाँ विपक्ष इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहा है, वहीं सत्ता पक्ष की खामोशी कई तरह के संकेत देती है. जो नेता हर छोटे-बड़े मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं, वे इस संवेदनशील विषय पर चुप क्यों हैं? क्या यह महज संयोग है या इसके पीछे व्यक्तिगत और राजनीतिक हितों का टकराव छिपा है?

कांग्रेस पार्टी का रुख भी दोहरा नजर आता है. राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलनों के प्रति सहानुभूति जताने वाली पार्टी, राज्य स्तर पर सीमित बयानबाजी तक सिमट जाती है. क्या यह सत्ता में बने रहने की मजबूरी है, या फिर यह संकेत है कि राजनीतिक दल इस मुद्दे को पूरी गंभीरता से उठाने से बच रहे हैं?

क्योंकि सवाल केवल नियुक्तियों का नहीं है—

सवाल है झारखंड के युवाओं के भविष्य का, और उस विश्वास का जिस पर एक राज्य की नींव टिकी होती है

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