बिहार की सियासत में शिक्षा बनाम विरासत का सवाल
पटना: बिहार की सियासत में इन दिनों नेताओं और उनके उत्तराधिकारियों की शैक्षणिक योग्यता को लेकर राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है। मौजूदा समय में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार की शिक्षा को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर है और ’12वीं पास इंजीनियर’ जैसे स्लोगन सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं। लेकिन यह मुद्दा सिर्फ निशांत तक सीमित नहीं है। एक वरिष्ठ पत्रकार के विश्लेषण के अनुसार, 21वीं सदी के बिहार के तीन सबसे बड़े दिग्गज नेताओं—लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और दिवंगत रामविलास पासवान—ने खुद तो उच्च शिक्षा हासिल की, लेकिन उनके बेटे कॉलेज की पढ़ाई भी पूरी नहीं कर सके। इसके बावजूद, पिता के सियासी रसूख के दम पर ये बिहार के नेताओं के बेटे आज राजनीति की मुख्यधारा में स्थापित हैं और उनका जलवा बरकरार है। यह स्थिति बिहार की राजनीति में शिक्षा के महत्व और वंशवाद के प्रभाव पर गंभीर सवाल उठाती है।
लालू यादव बनाम तेजस्वी यादव: विरासत का दम
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने छात्र जीवन से राजनीति में कदम रखा और अपनी वाकपटुता व जननेता की छवि के बल पर बिहार के मुख्यमंत्री से लेकर केंद्र में रेल मंत्री तक का सफर तय किया। लालू यादव खुद कानून (LLB) और राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री (MA) धारक हैं, जिनकी पढ़ाई पटना यूनिवर्सिटी से हुई। उनकी अकादमिक पृष्ठभूमि राजनीति में उनकी सूझबूझ का प्रमाण मानी जाती है। इसके विपरीत, उनके छोटे बेटे और राजद के मुख्य चेहरा तेजस्वी यादव केवल 9वीं कक्षा तक ही पढ़ सके। दिल्ली पब्लिक स्कूल (आरके पुरम, दिल्ली) से शुरुआती शिक्षा पाने वाले तेजस्वी का रुझान क्रिकेट की तरफ हो गया था, जिसके चलते वे मैट्रिक (10वीं) की परीक्षा भी पास नहीं कर सके। बावजूद इसके, आज वे बिहार की राजनीति में एक कद्दावर नेता और विपक्ष के नेता के तौर पर स्थापित हैं। वहीं उनके बड़े बेटे तेज प्रताप यादव भी किसी तरह कॉलेज तक ही पहुंच पाए और उनकी शिक्षा भी अधूरी ही रही। पिता की राजनीतिक विरासत ने उन्हें राजनीति में सीधे प्रवेश दिला दिया, जहां उन्हें अपनी जगह बनाने के लिए शैक्षणिक योग्यता की नहीं, बल्कि जनसमर्थन और नेतृत्व क्षमता की ज़रूरत पड़ी।
नीतीश कुमार बनाम निशांत कुमार: ’12वीं पास इंजीनियर’ का विवाद
बिहार के ‘विकास पुरुष’ और ‘सुशासन बाबू’ कहे जाने वाले नीतीश कुमार ने अपनी शिक्षा को हमेशा गंभीरता से लिया। उन्होंने साल 1972 में बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की थी। उनकी इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि उनके प्रशासनिक कौशल और विकास-उन्मुख सोच में झलकती है। इसके उलट, उनके पुत्र निशांत कुमार केवल 12वीं पास हैं। निशांत ने देश के प्रतिष्ठित संस्थान बीआईटी मेसरा (BIT Mesra) में इंजीनियरिंग में दाखिला तो लिया था, लेकिन वे अपने अंतिम वर्ष की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके और बीच में ही कोर्स छोड़ दिया। हाल ही में, उनके 12वीं पास होने के बावजूद ‘इंजीनियर’ कहे जाने पर विवाद खड़ा हो गया है। यह विडंबना ही है कि एक उच्च शिक्षित इंजीनियर पिता का बेटा अपनी उच्च शिक्षा पूरी नहीं कर पाया, लेकिन राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है।
रामविलास पासवान बनाम चिराग पासवान: अधूरे सपने, बुलंद इरादे
दलितों और वंचितों की मुखर आवाज रहे दिवंगत रामविलास पासवान ने भी राजनीति में आने से पहले अपनी शिक्षा पूरी की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय और कोसी कॉलेज से एमए (MA) और बैचलर ऑफ लॉ (LL.B) की डिग्री ली थी। केंद्र सरकार में वे लंबे समय तक कद्दावर मंत्री रहे और भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण हस्ती के तौर पर जाने जाते थे। वहीं, उनके पुत्र और वर्तमान केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने अपनी 10वीं और 12वीं की पढ़ाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (NIOS) से की। इसके बाद उन्होंने बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी (झांसी) से कंप्यूटर साइंस में बीटेक (B.Tech) में एडमिशन लिया, लेकिन तीसरे सेमेस्टर में ही पढ़ाई अधूरी छोड़कर वे वापस आ गए और बॉलीवुड में किस्मत आज़माने चले गए। हालांकि, बाद में उन्होंने अपने पिता की विरासत संभाली और आज केंद्रीय मंत्री के पद पर आसीन हैं। उनकी राजनीतिक यात्रा भी दिखाती है कि कैसे विरासत शैक्षणिक योग्यता पर भारी पड़ सकती है।
बिहार के नेताओं के बेटे: शिक्षा का बदलता परिदृश्य और जनमानस
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बड़े राजनीतिक घरानों की संतानों में पढ़ाई के प्रति अरुचि और बीच में ही कॉलेज छोड़ देना कोई नई बात नहीं है। भारत में वंशवाद की राजनीति एक पुरानी परिपाटी रही है, जहां बच्चे अक्सर अपने माता-पिता के प्रभाव के चलते सीधे राजनीतिक मैदान में उतर जाते हैं। इन पिताओं ने अपने बच्चों को अपने बराबर शिक्षित बनाने में भले ही सफलता न पाई हो, लेकिन विरासत की बदौलत उनके बेटों की कामयाबी आज राजनीति के मैदान में चमक रही है। यह दिखाता है कि बिहार की राजनीति में अभी भी जनता अक्सर नेताओं के अनुभव और उनके परिवारिक जुड़ाव को शिक्षा से अधिक महत्व देती है। यह एक ऐसा पहलू है जिस पर राजनीतिक विमर्श लगातार जारी है, और भविष्य में इसके क्या मायने होंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।
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समाज में अक्सर यह धारणा है कि राजनीति में आने के लिए उच्च शिक्षा अनिवार्य नहीं है, लेकिन एक शिक्षित नेता बेहतर नीतियां बनाने और दूरदर्शी निर्णय लेने में सक्षम होता है। हालांकि, उपरोक्त उदाहरण दर्शाते हैं कि व्यक्तिगत करिश्मा, परिवार का प्रभाव और जनसंपर्क कौशल अक्सर डिग्री से ज़्यादा मायने रखते हैं। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि राजनीति में प्रवेश के द्वार अभी भी उन लोगों के लिए व्यापक हैं जिनके पास मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि है, भले ही उनकी अकादमिक यात्रा पूरी न हुई हो।
