नई दिल्ली। केंद्र सरकार की ओर से जारी POSH हैंडबुक में यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली महिला की पहचान सामने आने के मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि जब कानून यौन अपराधों की पीड़िताओं की पहचान उजागर करने से रोकता है, तो सरकारी हैंडबुक में पीड़िता का नाम कैसे प्रकाशित कर दिया गया।
मामले की सुनवाई जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के समक्ष हुई। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार खुद ऐसी हैंडबुक प्रकाशित कर रही है, जिसमें पीड़िता की पहचान सामने आ रही है। कोर्ट ने सवाल किया कि आखिर ऐसा कैसे किया जा सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून का पालन करने की जिम्मेदारी सरकार की भी उतनी ही है, जितनी किसी अन्य व्यक्ति या संस्था की।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से प्रकाशित POSH यानी कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम से संबंधित हैंडबुक से जुड़ा है। इस हैंडबुक में करीब 25 साल पुराने एक मामले को उदाहरण के तौर पर शामिल किया गया था। आरोप है कि इसमें मामले से जुड़ी महिला की पहचान उजागर हो गई।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित मामला वर्ष 2001 का है और दोनों पक्षों के बीच अब विवाद सुलझ चुका है। इसके बावजूद मंत्रालय की हैंडबुक में मामले का विवरण इस तरह प्रकाशित किया गया कि पीड़िता की पहचान सामने आ गई। याचिकाकर्ता ने हैंडबुक से नाम हटाने के साथ-साथ इंटरनेट पर उपलब्ध संबंधित सामग्री को डी-लिंक और डी-इंडेक्स करने की मांग भी की है।
‘शैक्षणिक उद्देश्य’ के नाम पर नाम उजागर नहीं किया जा सकता
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से दलील दी गई कि हैंडबुक को वर्ष 2015 में शैक्षणिक उद्देश्य से प्रकाशित किया गया था। इस पर अदालत ने सवाल उठाया कि अगर उद्देश्य केवल शैक्षणिक है तो पीड़िता का वास्तविक नाम बताने की जरूरत ही क्या थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता की पहचान छिपाने के लिए नाम की जगह ‘X’ जैसे शब्द या किसी अन्य पहचान रहित तरीके का इस्तेमाल किया जा सकता है। अदालत ने साफ किया कि किसी पुराने मामले का उदाहरण देने के लिए भी पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करना उचित नहीं है।
अधिकारियों के नाम मांगे
दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार के वकील से उन अधिकारियों के नाम बताने को कहा, जिनकी मंजूरी या प्रक्रिया के तहत पीड़िता की पहचान वाली सामग्री हैंडबुक में शामिल हुई। कोर्ट ने अगली सुनवाई पर संबंधित अधिकारियों के नाम पेश करने को कहा है।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि किसी मामले में समझौता हो जाने से पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करने की अनुमति नहीं मिल जाती। पहचान की गोपनीयता बनाए रखना कानूनी जिम्मेदारी है।
कानून क्या कहता है?
POSH कानून में शिकायत और उससे जुड़ी कार्यवाही की गोपनीयता को विशेष महत्व दिया गया है। दिल्ली हाईकोर्ट के अपने दिशानिर्देशों में भी यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़िता या सर्वाइवर की पहचान, पता और अन्य ऐसे विवरण सार्वजनिक नहीं करने पर जोर दिया गया है, जिनसे उसकी पहचान हो सकती है।
दिल्ली हाईकोर्ट के POSH संबंधी नियमों में भी शिकायतकर्ता महिला की पहचान और शिकायत से जुड़ी जानकारी को सार्वजनिक करने पर रोक का उल्लेख है। न्याय मिलने की जानकारी साझा की जा सकती है, लेकिन पीड़िता का नाम, पता या पहचान उजागर करने वाली जानकारी सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए।
इस मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर 2026 को होने की जानकारी सामने आई है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि केंद्र सरकार अदालत के सामने संबंधित अधिकारियों के नाम और इस चूक को लेकर उठाए गए कदमों के बारे में क्या जानकारी देती है।
