Tuesday, September 22

जमशेदपुर, झारखंड: शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम, 2009 के तहत निःशुल्क शिक्षा प्राप्त कर रही एक छात्रा का भविष्य उस समय दांव पर लग गया, जब सोनारी स्थित आर.एम.एस. हाई स्कूल, बालिचेला ने कथित तौर पर फीस जमा न करने के कारण उसे परीक्षा में बैठने से रोक दिया। यह मामला, जो अब जमशेदपुर फीस विवाद के रूप में सामने आया है, पूरे शहर में शिक्षा के अधिकार के हनन और गरीब बच्चों के प्रति स्कूल प्रबंधन की असंवेदनशीलता को लेकर गरमा गया है। इस गंभीर मुद्दे को लेकर जमशेदपुर अभिभावक संघ ने जिला प्रशासन से हस्तक्षेप और सख्त कार्रवाई की मांग की है।

अधिनियम का उल्लंघन और छात्रा का दर्द

अभिभावक संघ के अध्यक्ष डॉ. उमेश कुमार ने बताया कि प्रभावित छात्रा चांदनी कुमारी का नामांकन आरटीई अधिनियम, 2009 की धारा 12(1)(सी) के तहत हुआ था। वर्तमान में वह वर्ष 2026-27 में कक्षा नौ की छात्रा है। यह अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में 25% आरक्षित सीटों पर निःशुल्क शिक्षा मिलनी चाहिए। बावजूद इसके, स्कूल प्रबंधन ने चांदनी पर लगातार फीस जमा करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया, जो कि आरटीई प्रावधानों का सीधा उल्लंघन है।

छात्रा के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। उसकी मां घरों में झाड़ू-पोछा और बर्तन साफ कर किसी तरह परिवार का गुजारा करती हैं। उनके लिए स्कूल की पूरी फीस एक साथ जमा करना असंभव था। मां ने स्कूल प्रबंधन से कई बार आर्थिक मजबूरी बताते हुए फीस किस्तों में जमा करने का अनुरोध भी किया, लेकिन उनकी गुहार अनसुनी कर दी गई। स्कूल प्रबंधन ने साफ इनकार कर दिया कि जब तक पूरी फीस जमा नहीं होगी, तब तक एडमिट कार्ड जारी नहीं किया जाएगा।

परीक्षा से वंचित, भविष्य पर सवाल

इस गंभीर परिणाम के चलते, 7 जुलाई को आयोजित होने वाली परीक्षा के लिए चांदनी कुमारी को उसका एडमिट कार्ड नहीं मिल सका और वह परीक्षा में शामिल नहीं हो पाई। यह एक ऐसी घटना है जो न केवल चांदनी के एक शैक्षणिक वर्ष को बर्बाद कर सकती है, बल्कि उसके मनोबल पर भी गहरा नकारात्मक प्रभाव डालेगी। एक गरीब परिवार की बेटी, जो शिक्षा के अधिकार के तहत अपना भविष्य संवारने का सपना देख रही थी, उसे सिर्फ फीस विवाद के कारण इस तरह वंचित किया जाना मानवीय मूल्यों और कानूनी प्रावधानों दोनों का हनन है।

शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 का उद्देश्य 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना है, विशेषकर वंचित और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए। इस अधिनियम की धारा 12(1)(सी) निजी स्कूलों को अपनी प्रारंभिक कक्षाओं में 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के बच्चों के लिए आरक्षित करने का आदेश देती है, जहां उन्हें निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जाती है। इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए आप राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की वेबसाइट देख सकते हैं, जो इस कानून के प्रावधानों पर प्रकाश डालती है।

जमशेदपुर अभिभावक संघ की कड़ी आपत्ति

इस पूरे प्रकरण को लेकर जमशेदपुर अभिभावक संघ बेहद आक्रोशित है। संघ ने मंगलवार को तत्काल कार्रवाई की मांग करते हुए उपायुक्त और जिला शिक्षा अधीक्षक को शिकायत पत्र सौंपा। डॉ. उमेश कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह आरटीई अधिनियम और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति दोनों के प्रावधानों का घोर उल्लंघन है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित वर्ग के बच्चों को निर्धारित नियमों के तहत निःशुल्क शिक्षा का अधिकार प्राप्त है, और किसी भी सूरत में उन्हें इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

प्रशासन से न्याय और कार्रवाई की मांग

अभिभावक संघ ने जिला प्रशासन से निम्नलिखित मांगें की हैं:

  • पूरे मामले की अविलंब जांच की जाए।
  • छात्रा चांदनी कुमारी के शैक्षणिक हितों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
  • उसे परीक्षा से वंचित किए जाने के मामले में स्कूल प्रबंधन के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की जाए।
  • स्कूल प्रबंधन को आरटीई और अन्य शिक्षा संबंधी नियमों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया जाए।

यह जमशेदपुर फीस विवाद केवल एक छात्रा की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन हजारों गरीब बच्चों के अधिकारों का प्रतिनिधित्व करता है जो शिक्षा के माध्यम से अपने जीवन को बेहतर बनाने की उम्मीद रखते हैं। इस घटना ने एक बार फिर निजी स्कूलों में आरटीई के कार्यान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

आगे की राह और उम्मीदें

अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है। अभिभावक संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि वे चांदनी को न्याय दिलाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। यह आवश्यक है कि स्कूल प्रबंधन अपनी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारियों को समझे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। शिक्षा सभी का मौलिक अधिकार है, और किसी भी बच्चे को आर्थिक कारणों से इससे वंचित नहीं किया जाना चाहिए। इस मामले में त्वरित और प्रभावी कार्रवाई ही ऐसे स्कूलों के लिए एक सबक होगी, जो शिक्षा को व्यवसाय मात्र मानते हैं।

Share.
Next Story
चांडिल पुल हादसा: बालू लदा हाईवा नहर में गिरा, बड़ा हादसा टला, ग्रामीणों में आक्रोश
Exit mobile version