Tuesday, September 22

स्काईरूट के ऐतिहासिक मिशन के पीछे रांची से निकले इंजीनियरों का महत्वपूर्ण भूमिका है

भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए 18 जुलाई 2026 एक ऐतिहासिक तारीख बनी,

स्काईरूट एयरोस्पेस ने देश का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 सफलतापूर्वक किया लॉन्च 

इस उपलब्धि के साथ भारत अमेरिका और चीन के बाद तीसरा ऐसा देश बना, जिसकी निजी कंपनी ने सैटेलाइट को कक्षा में स्थापित किया

बीआईटी मेसरा में रॉकेट इंजीनियरिंग पढ़ाने की शुरुआत भी 1964 में, यानी इसरो बनने से पांच साल पहले, नासा की तकनीकी मदद से हुई थी.

विक्रम-1 लॉन्च तिथि: 18 जुलाई 2026
– भारत निजी क्षेत्र से ऑर्बिटल रॉकेट भेजने वाला तीसरा देश बना (अमेरिका, चीन के बाद)
– विक्रम-1 टीम में बीआईटी मेसरा के पूर्व छह छात्र शामिल
– बीआईटी मेसरा रॉकेट्री विभाग स्थापना वर्ष: 1964 (इसरो से 5 वर्ष पहले)

– स्वाति सीरीज रॉकेट: कुल 33 निर्मित व परीक्षित
– 1967 नेशनल रॉकेट सिम्पोजियम: देश का पहला ऐसा आयोजन

हैदराबाद की निजी अंतरिक्ष कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेजा। इसके साथ भारत अमेरिका और चीन के बाद ऐसा तीसरा देश बना जिसने निजी क्षेत्र से सैटेलाइट कक्षा में स्थापित करने में सफलता पाई। इस मिशन स्काईरूट को सफल बनाने वाली टीम में रांची स्थित बीआईटी मेसरा के छह पूर्व छात्र शामिल है, जिन्होंने मिशन की डिजाइन और इंजीनियरिंग में अहम भूमिका निभाई।

भारत का पहला प्राइवेट रॉकेट 
स्काईरूट एयरोस्पेस ने हैदराबाद के अपने इन्फिनिटी कैंपस से विक्रम-1 रॉकेट को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। यह भारत का पहला निजी क्षेत्र से बना ऑर्बिटल-क्षमता वाला रॉकेट है . इस मिशन में बीआईटी मेसरा के रॉकेट एंड स्पेस साइंस डिपार्टमेंट के पूर्व छात्र, जिन्होंने यहाँ से पढ़ाई की थी, मिशन टीम में शामिल इंजीनियरों में राकेश साकोटे, प्रभु प्रसाद सारंगी, बाला विग्नेश डी, निखिल के उमंग जैन और राजेश रवि के नाम बीआईटी मेसरा से जुड़े पूर्व छात्र शामिल हुए हैं।

 

रांची में पहली रॉकेट प्रयोगशाला
1955 में स्थापित बीआईटी मेसरा ने 1964 में देश का पहला स्पेस इंजीनियरिंग एंड रॉकेट्री विभाग शुरू किया। यह इसरो की स्थापना से पांच साल पहले की बात है। डॉ. होमी जे. भाभा और डॉ. विक्रम साराभाई की पहल पर संस्थान ने नासा से तकनीकी सहयोग मांगा, जिसे अमेरिकी एजेंसी ने स्वीकार किया. 1962 को न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट में बीआईटी मेसरा के संस्थापक डॉ. बीएम बिड़ला और इनकॉस्पार के डॉ. विक्रम साराभाई के बीच ऐसे संस्थान की योजना पर चर्चा का जिक्र था। इसी के बाद बिड़ला परिवार ने रॉकेट सेंटर की स्थापना के लिए करीब 20 लाख डॉलर देने का वादा किया।

नासा और प्रिंसटन विश्वविद्यालय की भूमिका
भाभा के समर्थन और साराभाई के मार्गदर्शन के बाद नासा तकनीकी मदद के लिए राजी हुआ। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मॉरिस जे वेब को रांची भेजा गया, जिन्होंने प्रयोगशालाओं की डिजाइन तैयार की और शुरुआती प्रयोगों की रूपरेखा बनाई।युवा वैज्ञानिक और गणितज्ञ प्रोफेसर जीबी पंत, जिन्होंने हार्वर्ड से एमएस किया था, रांची में विभाग के विकास की निगरानी के लिए तैनात किए गए। वे जापान, अमेरिका, यूरोप और तत्कालीन सोवियत संघ जाकर वहां की रॉकेट तकनीक का अध्ययन कर लौटे।

रांची में बनी सुपरसोनिक विंड टनल
1964 में विभाग शुरू होने के बाद बीआईटी मेसरा में सुपरसोनिक और सबसोनिक विंड टनल लगाई गईं। प्रणोदन, दहन और वायुगतिकी (एयरोडायनामिक्स) की प्रयोगशालाएं बनीं, जो उस दौर में अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं के बराबर मानी जाती थीं।1967 में बीआईटी मेसरा परिसर में देश का पहला नेशनल रॉकेट सिम्पोजियम आयोजित हुआ। इनकॉस्पार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय और सीएसआईआर के वैज्ञानिक रांची पहुंचे और प्रणोदन व रॉकेट डिजाइन पर चर्चा की। उस समय देश का संगठित अंतरिक्ष कार्यक्रम अपनी शुरुआती अवस्था में ही था।

रांची में बनी और उड़ाई गईं 33 स्वाति रॉकेटें
1968 के आसपास विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की मदद से विभाग ने मौसम अध्ययन के लिए स्वाति सीरीज की साउंडिंग रॉकेटें डिजाइन कीं। कुल 33 रॉकेटों का निर्माण हुआ, जिनका परीक्षण हजारीबाग, चांदीपुर और अन्य रेंज में किया गया।जिस दौर में दुनिया भर में हाइब्रिड रॉकेट प्रणोदन प्रयोगात्मक स्तर पर ही था, बीआईटी मेसरा के वैज्ञानिकों ने इस पर शोध शुरू कर दिया था। आज इसरो, डीआरडीओ और निजी कंपनियां इसी तकनीक में रुचि ले रही हैं क्योंकि यह ज्यादा लचीली और सुरक्षित मानी जाती है।

वर्जन
बीआईटी मेसरा का स्पेस इंजीनियरिंग एंड रॉकेट साइंस डिपार्टमेंट भारत का सबसे पुराना डिपार्टमेंट है। यहाँ से देश और दुनिया में कई ऐसे साइंटिस्ट ने पढ़ाई की है जिन्होंने दी सब दुनिया में रॉकेट साइंस में बड़ा योगदान दिया है।वर्तमान में स्काई रूट एयरोस्पेस के साथ जुड़कर, बीआईटी मेसरा के 6 पूर्व छात्रों ने विक्रम 1 की सफल लॉन्चिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
डॉ॰ प्रियांक कुमार, हेड ऑफ द डिपार्टमेंट
स्पेस इंजीनियरिंग एंड रॉकेट साइंस डिपार्टमेंट, बीआईटी मेसरा, रांची

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